मेरा क्या हैं कुछ नहीं मेरा ये नाम-खानदान भी उनका
पैरो तले कुचल दिया और मानूँ ये अहसान भी उनका
पहचान भी उनकी ज़ात भी उनकी सम्मान भी उनका
औरत होने के नाते मेरे नाम का कन्यादान भी उनका
सोचा कि बगावत करलु अपनों सें और अपने आप सें
फिर याद आया मेरा धर्म भी उनका मशान भी उनका
कहाँ भागकर जायँगे अपनों के तानो सें तंग आकर के
घर के बाहर की ज़मीं भी उनकी आसमान भी उनका
शिकायत क्या करे और किससे करे ये बता ऐ आईना
ज़िस्म का लहु भी उनका ये ज़िस्मि मकान भी उनका
कृष्णा का वजूद तों जैसे मुट्ठीभर रेत सें भी गया गुजरा
कैसे जीना हैं कब तलक़ जीना हैं ये फरमान भी उनका
-कृष्णा शर्मा


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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