हर चोट,हर मार क़ो अपने सीने पऱ सहते रहे
कांच के होकर भी पत्थर के महल में रहते रहे
टूट-फूट इतनी हुई कि सबकुछ चूरा-चूर हुआ
दोष किस पत्थर क़ो देते हर मार पे चुप बैठे रहे
ज़ुल्म शुरू हुआ गैरों सें अपनों तक पहुँच गया
हम जिम्मेदार औलाद वो सब शानो पे ढ़ोते रहे
भाग्य ऐसा लिखा ख़ून हीं ख़ून का यक़ी न करे
चीख़-पुकार, रोना-धोना सब व्यर्थ हीं करते रहे
नहूसत कहूँ या कहूँ बद्दुआ ख़ुद क़ो, पता नहीं
हर फर्ज़ अदा करके भी हम लानत में जीते रहे
कृष्णा क़ो समझ नहीं आता इताब किससे करे
हर शख्श तों गैर था हम ख़ामखा गिले करते रहे...
-कृष्णा शर्मा
इताब = गुस्सा / नाराज़गी


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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