जब तक खिले हैं फूल खुशबू उसके साथ है
चार दिन की चांदनी है फिर अँधेरी रात है
रोते नहीं है कभी भी जख्म चाहे जितने मिले
इन परिंदो में कसम से कुछ तो बात है
कहते नहीं कुछ मगर हैं बड़े ज़ालिम ये लोग
देंगे वो गर्दन उड़ा जिस पे उनका हाथ है
इश्क का मसला बड़ा नाजुक हुआ इनदिनों
इस तरफ भी हार है उस तरफ भी मात है
दास उसका जर खरीद जो है अपना नाखुदा
चाहे जैसा हो सुलूक दिल उसी के साथ है !!


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







