Newहैशटैग ज़िन्दगी पुस्तक के बारे में updates यहाँ से जानें।


Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat


Show your love with any amount — Keep Likhantu.com free, ad-free, and community-driven.

Show your love with any amount — Keep Likhantu.com free, ad-free, and community-driven.



The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

Newहैशटैग ज़िन्दगी पुस्तक के बारे में updates यहाँ से जानें।

Newसभी पाठकों एवं रचनाकारों से विनम्र निवेदन है कि बागी बानी यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करते हुए
उनके बेबाक एवं शानदार गानों को अवश्य सुनें - आपको पसंद आएं तो लाइक,शेयर एवं कमेंट करें Channel Link यहाँ है

The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

हे नटनागर


बिंदु-बिंदु में वास तुम्हारा,
कण-कण में विस्तार तुम्हारा।

श्वासों का प्रत्येक स्पंदन,
गाता नित्य ही नाम तुम्हारा।

सूक्ष्म तंतु की मौन लय में,
गूँजे मधुर विहार तुम्हारा।

अणु-अणु की अंतर-ज्योति में,
दिखता दिव्य प्रकाश तुम्हारा।

जल की निर्मल हर लहरों में,
झलके श्याम विहास तुम्हारा।

पवन सुनाए प्रेम-सरगम,
वन गाए उल्लास तुम्हारा।

धरती का प्रत्येक कण बोले,
"कृष्ण" ही विश्वास हमारा।

नील गगन की असीम चादर,
ओढ़े अनुपम रंग तुम्हारा।

सूर्य-किरण का स्वर्ण प्रभामंडल,
लगता मधुर प्रसाद तुम्हारा।

चंद्र-किरण की शीतलता भी,
मानो कोमल स्पर्श तुम्हारा।

तारों की अनुपम माला में,
दमके नित्य श्रृंगार तुम्हारा।

ग्रह-नक्षत्रों की हर गति में,
छिपा हुआ व्यवहार तुम्हारा।

कालचक्र की गति अविरल,
माने दिव्य विधान तुम्हारा।

सृष्टि, स्थिति और संहारों में,
गूँजे अमर स्वरूप तुम्हारा।

माया भी तेरी, लीला तेरी,
जीवन भी उपहार तुम्हारा।

राधा का निष्कलुष समर्पण,
प्रेम बने विस्तार तुम्हारा।

वंशी की अनुपम तान सुनाकर,
जीव जगाओ पार तुम्हारा।

भक्ति बने जब शुद्ध चेतना,
मिट जाए अंधकार सारा।

सूक्ष्म तत्त्व से महाकाश तक,
एक तुम्हारा ही उजियारा।

अनंत ब्रह्मांडों के स्वामी,
फिर भी मन के अति निकट प्यारे।

अंतर्यामी, परम करुणामय,
हर प्राणी के तुम रखवाले।

जहाँ दृष्टि, वहाँ कृष्ण दिखाई,
जहाँ सृष्टि, वहाँ धाम तुम्हारा।

नाम तुम्हारा सत्य सनातन,
शाश्वत दिव्य प्रणाम हमारा।

अंत नहीं तेरी महिमा का,
शब्द रहें सदैव बेचारे।

काव्य झुके तेरे चरणों में,
स्वर हों केवल गुणगान तुम्हारे।

हे नटनागर, हे गिरिधर,
स्वीकारो यह भाव हमारा।

कण से लेकर ब्रह्मांडों तक,
कृष्णमय है सारा पसारा।


  बिंदु-बिंदु में वास तुम्हारा      कण-कण में विस्तार तुम्हारा। श्वासों का प्रत्येक स्पंदन      गाता नित्य ही नाम तुम्हारा। सूक्ष्म तंतु की मौन लय में      गूँजे मधुर विहार तुम्हारा। अणु-अणु की अंतर-ज्योति में      दिखता दिव्य प्रकाश तुम्हारा। जल की निर्मल हर लहरों में      झलके श्याम विहास तुम्हारा। पवन सुनाए प्रेम-सरगम      वन गाए उल्लास तुम्हारा। धरती का प्रत्येक कण बोले      "कृष्ण" ही विश्वास हमारा। नील गगन की असीम चादर      ओढ़े अनुपम रंग तुम्हारा। सूर्य-किरण का स्वर्ण प्रभामंडल      लगता मधुर प्रसाद तुम्हारा। चंद्र-किरण की शीतलता भी      मानो कोमल स्पर्श तुम्हारा। तारों की अनुपम माला में      दमके नित्य श्रृंगार तुम्हारा। ग्रह-नक्षत्रों की हर गति में      छिपा हुआ व्यवहार तुम्हारा। कालचक्र की गति अविरल      माने दिव्य विधान तुम्हारा। सृष्टि      स्थिति और संहारों में      गूँजे अमर स्वरूप तुम्हारा। माया भी तेरी      लीला तेरी      जीवन भी उपहार तुम्हारा। राधा का निष्कलुष समर्पण      प्रेम बने विस्तार तुम्हारा। वंशी की अनुपम तान सुनाकर      जीव जगाओ पार तुम्हारा। भक्ति बने जब शुद्ध चेतना      मिट जाए अंधकार सारा। सूक्ष्म तत्त्व से महाकाश तक      एक तुम्हारा ही उजियारा। अनंत ब्रह्मांडों के स्वामी      फिर भी मन के अति निकट प्यारे। अंतर्यामी      परम करुणामय      हर प्राणी के तुम रखवाले। जहाँ दृष्टि      वहाँ कृष्ण दिखाई      जहाँ सृष्टि      वहाँ धाम तुम्हारा। नाम तुम्हारा सत्य सनातन      शाश्वत दिव्य प्रणाम हमारा। अंत नहीं तेरी महिमा का      शब्द रहें सदैव बेचारे। काव्य झुके तेरे चरणों में      स्वर हों केवल गुणगान तुम्हारे। हे नटनागर      हे गिरिधर      स्वीकारो यह भाव हमारा। कण से लेकर ब्रह्मांडों तक      कृष्णमय है सारा पसारा। 


समीक्षा छोड़ने के लिए कृपया पहले रजिस्टर या लॉगिन करें

रचना के बारे में पाठकों की समीक्षाएं (1)

+

मनोज कुमार सोनवानी "समदिल" said

आदित्य जी,अब क्या लिखूं,समझ ही नहीं आ रहा है,अगर मैं प्रशंसा करूं तो समझिए कि सूरज को दीपक दिखा रहा हूं। भक्ति -जलधि की पूरी लहरों से मन - धरा को नहला दिया है आपने।गजब गजब गजब,कण कण में व्याप्त ईश्वर की अनुपम सत्ता को ओजमयी,गीतमयी शब्द मोतियों से सुंदरतम सजावट। क्या बात है 👌🙏🙏🙏🙏

कविताएं - शायरी - ग़ज़ल श्रेणी में अन्य रचनाऐं




लिखन्तु डॉट कॉम देगा आपको और आपकी रचनाओं को एक नया मुकाम - आप कविता, ग़ज़ल, शायरी, श्लोक, संस्कृत गीत, वास्तविक कहानियां, काल्पनिक कहानियां, कॉमिक्स, हाइकू कविता इत्यादि को हिंदी, संस्कृत, बांग्ला, उर्दू, इंग्लिश, सिंधी या अन्य किसी भाषा में भी likhantuofficial@gmail.com पर भेज सकते हैं।


लिखते रहिये, पढ़ते रहिये - लिखन्तु डॉट कॉम


LIKHANTU DOT COM © 2017 - 2026 लिखन्तु डॉट कॉम
Designed, Developed, Maintained & Powered By HTTPS://LETSWRITE.IN
Verified by:
Verified by Scam Adviser
   
Support Our Investors ABOUT US Feedback & Business रचना भेजें रजिस्टर लॉगिन