हर सुनने वाला
अपना नहीं होता,
कुछ लोग सुनते हैं
सिर्फ़ यह जानने के लिए
कि आपकी आवाज़
कब काँपती है।
उन्हें आपकी योजना में
छिपा सपना नहीं दिखता,
उन्हें तो इंतज़ार रहता है
उस एक मोड़ का,
जहाँ आपकी राह
थोड़ी कठिन हो जाए,
जहाँ आपके कदम
एक पल को ठिठक जाएँ।
आप किस उम्मीद से चले थे,
किस विश्वास को सीने में रखकर
दिन-रात जुटे रहे—
इससे उन्हें कोई सरोकार नहीं,
वह तो बस यह देखना चाहते हैं
कि आप कहाँ हारे।
इसलिए
हर मुस्कान को अपनापन मत समझिए,
हर सलाह को सद्भाव मत मानिए,
और हर सुनने वाले के सामने
अपने मन का दरवाज़ा
पूरा मत खोलिए।
कुछ रिश्ते
सिर्फ़ शब्दों तक अच्छे लगते हैं,
कुछ लोग
आपकी कहानी सुनते हैं
ताकि किसी दिन
उसे आपकी कमज़ोरी की तरह
सुना सकें।
मगर आप चलते रहिए...
क्योंकि
जो सचमुच अपने होते हैं,
वह आपकी हार पर
तालियाँ नहीं बजाते,
वह चुपचाप
आपके पास बैठते हैं,
आपके बिखरे हुए हौसले को
दोनों हाथों से समेटते हैं
और कहते हैं—
चलिए, फिर से शुरू करते हैं।
और जो आपकी हार देखने को
उत्सुक बैठे हैं,
उन्हें देखने दीजिए।
उन्हें क्या पता—
कुछ यात्राएँ
जीतने के लिए नहीं,
खुद को बचाए रखने के लिए
तय की जाती हैं।
आप गिरें,
तो यह अंत नहीं है।
कभी-कभी
गिरना भी ज़रूरी होता है
यह पहचानने के लिए
कि भीड़ में
कौन तमाशबीन था
और कौन
वास्तव में अपना।
डॉ. अखिलेश श्रीवास्तव


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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