यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा अपनापन है,
थक गया हूँ, पर मन से दृढ़ रहना है।
फिर से शुरू नहीं हो सकता क्योंकि कहीं से शुरू नहीं हुआ,
जो हुआ वो हुआ, कहीं हो चुका था,
जहाँ से मैं शामिल था ।।
उस दिन जब हम उस एक के पीछे,
छोटे रास्तों से बड़े रास्तों की तरफ चलते गए,
हमें अजीब नहीं लगा,
पर अपने को देखना था,
कि अपना होना,
और उसका खोना,
क्यूँ हो रहा है बार बार,
हम आगे बढ़ते हैं,
और वो उसी रास्ते के,
पहले बिंदु पर चला जाता है,
क्यूँ आगे की राह,
पर पीछे की जिंदगी में याद और सुकून दिखाता है,
जो गुजर जाता है,
फिर याद आता है,
वो अकेला,
क्या ऐसा लेके बैठा है,
जो हमें गुना अधिक करता है,
पर खुद को छूने नहीं देता है,
उसको नहीं क्या हो रहा,
या उसने भी होते देखा,
क्या खाली है,
कहां भरा था,
कैसे किया,
और क्यूँ मुझे उसका ही प्रश्न मिला,
वो दे सकता है,
जिसकी दुनिया को वो देखे,
जैसा मैं चाहूँ,
पर उससे ही प्राप्त होगा,
इंसान तो सिर्फ खोजी है,
जैसे मैं ढूंढ रहा हूं,
उसका अकेलापन।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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