जब सुबह देर से दस्तक दे
और रात लंबी लगने लगे,
जब अपने भी सवाल बन जाएँ
और मौन भारी होने लगे,
तब मन के किसी कोने में
धीरे-धीरे जल उठती है
एक छोटी-सी लौ—
वही पहला विश्वास।
टूटे सपनों की चुभन में
जब शब्द भी घायल हों,
और रास्ते पत्थर-से सख़्त,
पाँव थककर रुकना चाहें,
तब बिना शोर किए
हाथ थाम लेता है
एक अदृश्य सहारा—
जिसे कहते हैं विश्वास।
न मंज़िल पास दिखती है,
न दिशा साफ़ नज़र आती,
फिर भी कदम आगे बढ़ते हैं,
क्योंकि भीतर कहीं
यह यक़ीन साँस लेता है
कि हर अँधेरे के बाद
उजाले का एक दिन होगा—
इसी से बनता है जीवन का विश्वास।
कभी वही लौ
आँखों की नमी बन जाती है,
कभी चुप्पी में ढलकर
हिम्मत की भाषा सिखाती है।
यह न दिखती है, न सुनाई देती,
फिर भी टूटने नहीं देती।
कठिन मोड़ों पर
जब सब कुछ छूटता सा लगे,
तब यही भीतर की ताक़त
संभाल लेती है बिखरते पल।
शायद इसी कारण
मन हर बार फिर कह उठता है—
चलना अभी बाकी है।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







