ये रात भी गुज़र गई, दर्द-ए-फुरकत के साथ..
कब तक रहूं तेरी, ज़रूरत-ए-बेमुरव्वत के साथ..।
ज़माना तो अब, किसी और अफ़साने में मसरूफ़ है..
तुम ख़्वाब छोड़कर आना, दिल-ए-हकीकत के साथ..।
माज़ी की सरहदों पे, अश्क-ए-आहों की फौजें हैं..
फ़िर भी ये दिल, पेश आता है उनसे मुहब्बत के साथ..।
वो मिलते हैं जाने क्या क्या छुपाकर दिल में हकीकतें..।
मगर हम मिलते हैं, अपनी इन्सानी फ़ितरत के साथ..।
औरों की क्या कहूं, मैं खुद ऐब-ए-रक़ीब से परेशाँ हूं..
मैं उनके रूबरू जा न सका, दिल-ए- मा'ज़रत के साथ..।
पवन कुमार "क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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