दर्द दिल का बयां करूँ तो मैं करूँ कैसे,
दामन में खुशियाँ छुपा कर रखूँ तो मैं रखूँ कैसे।
ज़रा सा मुस्कुराती हूँ तो नज़र लग जाती है ज़माने की,
आखिर ज़माने के सामने हँसू तो मैं हँसू कैसे।
अश्क़ बहते हैं जब आँखों से, तो मज़ा आता है ज़माने को,
ज़रा सा मुस्करा दूँ तो बुरा लग जाता है ज़माने को।
आखिर दो पल सुकून के जीऊँ तो मैं जीऊँ कैसे।
खुद को तन्हा महसूस करती हूँ, दुनिया की भीड़ में,
इस ज़ालिम ज़माने में अपना किसी को कहूँ तो कहूँ कैसे।
जब खुशियाँ दस्तक देती हैं दरवाज़े पर हमारे,
ग़म खिड़की से आकर उनका रास्ता रोक लेते हैं।
खुशियों को अपने आँचल में बाँधकर रखूँ तो मैं रखूँ कैसे,
दर्द अपने दिल का बयां करूँ तो मैं करूँ कैसे।
— सरिता पाठक
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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