मुख पर मीठे बोल हैं, मन में भरा विकार।
स्वार्थ साधने में लगे, बनकर वह वफ़ादार॥
सत्य खड़ा दरबार में, झूठ चढ़े सिरमौर।
गुण की कोई पूछ नहीं, चाटुकार का दौर॥
कुर्सी बदले, सुर बदल, बदले अपना राग।
स्वार्थ जहाँ दिखता उन्हें, वहीं करें अनुराग॥
जय-जयकारों में छिपा, अक्सर झूठा मान।
सच कहने वाले रहें, सबसे अधिक अनजान॥
जब सच पर पहरे लगें, झूठ बने सरताज।
समझो पतन निकट आ गया, चाहे हो जय-राज॥
डॉ. अखिलेश श्रीवास्तव


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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