Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

आंतरिक मुस्कान

जब पैसे होते हैं तो खुशियाँ हमें महसूस होती,
हमारे पास नहीं होती है,
जब पैसे नहीं होते हैं तो हम खुशियाँ पहचान लेते हैं,
ये खुशियाँ उस वक्त हमारे पास होती,
हमारे चारों तरफ होती है,
और जब हम सोचते हैं थोड़े पैसे होते तो खुशियाँ जी लेते,
तब हमें खुशियों का सबसे खूबसूरत दर्शन प्राप्त होता है,
तब खुशियां बड़े हक़ से हमारे पास आती क्योंकि उस वक्त पैसों से उसकी कोई सीमाएं नहीं रखते,
जब पैसे आते हैं तो हमें खुशियांँ आती जाती नज़र आती है,
हम पैसों में इतना खो जाते हैं कि हम खुशियों का दायरा बढ़ाने लग जाते हैं,
हमारे और उनके के बीच सीमाओं की दूरी बढ़ने लग जाती है,
तब हम परखने लग जाते हैं,
फिर वो बिना पैसों वाली खुशियाँ कभी नहीं मिली,
जिसके लिए पैसा चाहिए था,
यहाँ सबके मत अलग अलग हो सकते हैं,
तो हम विवाद से बच सकते हैं,
ऐसा तो मेरा मत था,
चाहे पैसा हो या खुशियां सबकुछ मेरे तो है नहीं,
इसलिए इनकी उधारी को जग अपने हुनर से माफ कर देगा,
मैं तो अपने भीतर ही खुशियों का निर्माण करता हूँ,
इसलिए खुद में ही एक मुस्कान रहती है,
इसलिए खुशियां और पैसे भी मेरे पास साल भर में एक आध बार आ जाते हैं,
जहाँ मेरी भीतरी मुस्कान के सामने अपना असर नहीं रख पाते,
क्या करें इसी कारण हमसे कइयों की मुठभेड़ हो जाती है,
वो बाहरी खुशियों को चाहने वाले हैं,
जो हमें स्वीकार नहीं होती,
तभी वो हमसे नाराज़ रहते हैं,
पर हम अपनी मालिकाना चीज नहीं खोना चाहते,
ये आंतरिक मुस्कान बहुत उदासी के बाद मिलती है।।

- ललित दाधीच




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