चाहतें भरीं हों खिलने की, कलियों में गिन गिनकर,
नवाजा है कुदरत ने तुम्हें,वो खासियत चुन चुनकर।
लगता है, ये काली घटाएं थोड़ी बिखर सी गई हों
किरणें तुम्हारी केशुओं से, आती जब छन छनकर।
तुम्हें देख जिसने आह न भरी हो,बदनसीब होगा,
निकले जाती हो गलियों में, तुम इतना बन ठनकर।
मूंदकर आंखें जब मुस्कराती हो तुम,मद्धिम मद्धिम
लगती हो प्रेम मिट्टी से, निकली हो जैसे सन सनकर।
तुम्हें देखकर लोगों के हाव भाव ऐसे बदल जातें हैं,
राजसी स्वयंवर में शूरवीर जैसे,खड़े हों तन तनकर।।
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







