चाहत थी कि वो गले मिले मेरा महबूब बनकर
वो मेरे दर पर आया भी तो मेरा रक़ीब बनकर
चाहतो के सिले कुछ ऐसे दिए उस ज़ालिम ने
वो मेरा इश्क़ बना भी तो मेरी तकलीफ बनकर
इश्क़ का कमाल ये के खरीददार नहीं मिलता
प्रेमी चुभता हैं जैसे भिखारी की भीख बनकर
वो एक पल भी ख़फ़ा हो तो विराना लगता हैं
ख़ामोशी भी ऐसे चुभती हैं जैसे चीख बनकर
इश्क़ क़ो हारकर अना क़ो गिरवी रखना पड़ा
हम पेश हुए उसके आगे जैसे तहरीक बनकर
वकील बनने की ख्वाहिश कुछ यूँ रही कृष्णा
शायद मुलाक़ात हो जाये कोई तारीख बनकर..
- कृष्णा शर्मा


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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