भ्रम हमेशा ही मन में यूँ पलता रहा,
रफ़्ता-रफ़्ता ये जीवन भी चलता रहा।
साथ रहते भी जो पास ना आ सके,
उनकी यादों में बस मन मचलता रहा।
उनके मुखड़े की लाली थी ऐसी खिली,
भोर का जैसे दिनकर हो निकला अभी।
झील के दो कमल से उनके दोनो नयन,
बात गुपचुप किए, मन सुलगता रहा।
दिल वीराना मेरा खिलता उपवन हुआ,
ठहठहाकर वो एक बार हँस क्या दिए
और सरकाई काँधे से जो खुद ओढ़नी,
सर्द ख़्वाबों में भी मन फिसलता रहा।
ज़ुल्फें बिखरा वो निकले कभी पास से,
उठा शीतल पवन का झकोरा कोई।
तन की खुशबू से मन तो हुआ बावरा,
उलझा जुल्फों में उनकी भटकता रहा।
चलना उनका कदम-दर-कदम झूमकर,
अरण्य-पथ पर चले मानो गजगामिनी।
हौले-हौले नितम्बों का खुद काँपना,
मीठी धुन पर वो मानो थिरकता रहा।
पास बैठे वो एक दिन कहा प्यार से,
मन का इतना मचलना कहाँ ठीक है।
बात उनकी समझकर लगा सोचने,
कैसे हर मोड़ पर वक्त बदलता रहा।
सपने देखा सतरंगी मैंने जिनके लिए,
अपना समझा था जिन्हें न वो मेरे हुए,
दिन-ब-दिन यूँ ही कटती रही जिंदगी,
रात ढलती रही दिन निकलता रहा।
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©️✍🏻प्रमोद कुमार,
गढ़वा (झारखण्ड)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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