हर शाम हँसी के मेले थे,
भीतर कोई रोता रहा,
चेहरे पर सूरज टाँके मैं
अँधेरों को ढोता रहा।
जिसको अपना घर समझा था,
वो रस्ता निकला धूल भरा,
मैं दीप जलाता रहा मगर
मन का आँगन शूल भरा।
सबने ताली दी शब्दों को,
कोई मौन न पढ़ पाया,
मैं दर्द छुपाकर गाता था,
बस स्वर ने सच बतलाया।
जब-जब टूटा, तब गीत बने,
जब गीत बने, संसार मिला,
पर उस भीड़ भरे उत्सव में
मुझको कब अपना प्यार मिला।
मैं नदिया बनकर बहता रहा,
सबकी प्यास बुझाने को,
पर मेरी सूखी आँखों में
कोई बादल न आया ।
अब थककर बैठा हूँ खुद से,
कुछ सपनों की राख लिये,
जो जीत मिली इस जग से मुझे,
वो हारों का इतिहास लिये।
लोगों ने मेरा नाम लिखा
उज्ज्वल पत्थर की दीवारों पर,
पर मैंने खुद को खो डाला
चलते-चलते बाज़ारों पर।
अब लौट रहा हूँ भीतर मैं,
जहाँ शोर नहीं, बस साँस रहे,
जहाँ गीत नहीं, बस सच ठहरे,
जहाँ मन अपने पास रहे।
जग अब भी कहता — “जीत गया”,
पर दिल चुपके ये कहता है,
जो खुद को पा ले भीड़ में भी,
असल में वही तो रहता है।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







