ट्रेन से जाने का सुकून ही कुछ और होता है,
हर स्टेशन पास आता है, पर उतरना कहीं और होता है।
खिड़की से नज़ारे लाख हसीन दिखते जाते हैं,
पर दिल जानता है, ठहरना वहाँ नहीं होता है।
ज़िंदगी भी एक ट्रेन की तरह चलती रहती है,
रुकावटें स्टेशन बनकर राह में मिलती रहती हैं।
अगर हर मोड़ पर हम भटक कर उतर जाएँ,
तो मंज़िल तक पहुँचने की उम्मीद खो जाती है।
इसलिए ऐ दिल, भटकने से खुद को बचा ले,
हर चमकती राह को मंज़िल न बना ले।
विश्वास रख अपने सफ़र और अपने इरादों पर,
ज़िंदगी की ट्रेन तुझे मंज़िल तक पहुँचा देगी
— गीतांजलि Gavel ✍️


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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