भारत में एक तिहाई,
जन समूह मुस्लिमों का है,
वो भी देश की प्रगति में,
अपना मेहनतनामा,
लिखता है,
अपना जीवन समर्पित करता है,
मगर उसकी शिक्षा पर,
ध्यान देने की कमी थी,
ये ना देखा कि,
कितनी प्रतिभा होगी उनमें भी,
उनको जोड़ा गया,
एक झूठे तराजू में,
राजनीति ने उनको आँसू दिए,
मगर वो,
जन समूह जिसमें,
कुछ तामसिक,
चेहरों ने पूरे उस समाज को,
नींद से अंधा किया,
देश वास्तविक प्रधान ने,
बहुत शौक पूरे किए,
अपने ही लोगों,
अलग करते गए,
मगर देश की,
और किसी जन के हित की,
जो ना सोचे,
वो सच्चाई से,
वो जाग्रति से दूर है,
उसका खुद से मिलना,
मुश्किल है,
मगर जो बनते हैं,
सांसद,
विधायक,
मंत्री,
अफसर,
कर्मचारी,
मालिक,
व्यापारी,
जिम्मेदार,
नेता,
शिक्षित,
छात्र,
युवा,
जागरुक,
वो जब रुक जाते हैं,
वो झुक जाते हैं,
पैसों में,
प्रसिद्धि में,
मूल काम छोड़ दे,
तो वर्तमान की,
स्थिति में,
खुद को देख लो,
समाज देश,
और उनके संतुलन को देख लो,
मगर बात स्वार्थ में नहीं,
आर्थिक जीवन जब,
उसके लिए मूल सुविधा ना दे,
देश में जब जन जागरण ना हो,
जनता जब,
मूल समझ ना रखें तो,
तकलीफ है,
मुश्किलें हैं,
असल में सरकार आप ही हो,
फ़ालतू के मत भेद,
मन भेद ना रखो,
मगर शिक्षा की,
पूर्णता को समझना,
ज़रूरी है,
विश्वास की उम्मीदों को सब,
मिलकर पूरी करेंगे,
दुनिया को जानने से,
पहले देश को सब जन समूह देखो,
कवि,
कविता से उठो,
शब्दों को उठाओ,
जन समूह,
जन जन को उठाओ,
मिलकर हो या अकेले हो,
जीवन और जनता,
चरित्र और देश,
इनमें मिलन,
इनसे तरक्की की,
सेवा और कर्त्तव्य की,
भूमि बनना जरूरी है,
अपनेपन के लिए,
अपना चलना ज़रूरी है,
अपना मनुष्य होना ज़रूरी है,
मगर ये धर्म की कोई शिक्षा नहीं है,
मगर ये नियमों की रोक टोक,
जन समूह को एक देश का होने नहीं देती है,
देश का संविधान सही है,
देश में मूल सार्वजनिक समझ सही है,
ये नियम सही है,
मूल बात है,
आप सभी को व्यापारी बना दिए हो,
आप चालाकी की रोटी खिला रहे हो,
देश की प्रकृति को रिश्ते बनाए,
उनको अस्तित्व को मैला कर दिया,
जो रिश्ते थे उनको,
चाहे वो वृद्ध हो,
युवा हो,
बचपन हो,
सभी रिश्ते खत्म कर दिए,
बस उनमे यही बातें थी भविष्य भविष्य,
बचत बचत,
घर का काम काम,
चुगली चुगली,
सोना सोना,
बेटी बेटी,
बेटा बेटा,
नौकरी नौकरी,
पैसा पैसा,
सवाल सवाल,
मान सम्मान अपमान,
और संस्कार,
लेकिन कुछ भी सही हुआ,
ना बस थोड़ा सा बचा है,
कुछ नहीं हुआ,
तो जाति, गोत्र, धर्म, लिंग,
इनको,
रंग, रूप, काम और पैसा,
इनको,
अपने देश के जन समूह,
अलग थलग करने के लिए,
ना बढ़ावा दो,
ना बढ़ावा दो,
इंसान बनता,
प्रकृति की सीख से,
शिक्षा लो,
मेहनत करो,
वर्तमान को देखो,
पैसे का समान वितरण को देखो,
है क्या,
सारा पैसे,
कुछ ने ही,
बाँट लिया,
बाँट लिया,
उसके लिए,
आगे नियम हो,
क्यूं कुछ को ही नसीब हो,
संसाधनों को,
सार्वजनिक साधनों को,
वीआईपी ना बनाओ,
कौन वीआईपी,
इंसान तो नहीं बने,
वीआईपी बनते हो,
आवाज़ से उठो,
आवाज उठाओ,
मुस्लिमों को भी वो शिक्षा दो,
जो हमने सामन्यतः ली,
वो बंध तहखाने में,
उनको कुछ गलत सिखाते हैं,
तो उनको भी सुविधा दो,
ऐसे ही महिला, पुरुष और अर्धनारीश्वर रूप,
भी समान है,
सम्मान है,
बाक़ी मैं गलत नहीं हो सकता,
मैंने किसी,
टीवी में देश हित,
नहीं देखा नहीं देखा,
विश्वास नहीं तो खंडहर,
होते स्कूल, कॉलेज, हॉस्पिटल, सड़कें, बगीचे,
हवा, पानी, ऊर्जा स्त्रोत,
अरे बोलने स्वतंत्रता का हाल देख लो,
गर्मी में पैर जले,
तूफ़ान में छत उड़े,
सर्दी में कंपकंपी,
दुर्घटना से मरे हो,
देख लो,
देख लो,
हाँ चलो,
मेरे पर्स को,
खोलता हूँ,
अगर खाली है,
तो अपने शब्द वापिस लेता हूं,
और कुछ है तो,
काट छाँट लो,
सौप देता हूं,
बात पैसे की,
कहीं तो अटक जाती हैं।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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