अब नही होती मनोहार प्रभात जैसी।
न ही महसूस होती सुनहरी साँझ जैसी।।
अतीत के दायरे में कुंठा सिमटने लगती।
उदासी पूरे जिस्म पर छाई है बाँझ जैसी।।
जीवन में किसी रंग का कोई स्थान नही।
शक्तिमान मन की हालत असहाय जैसी।।
बहुत कुछ व्यक्त करने को जी चाह रहा।
अन्तःकरण में साहस की कमी हाय जैसी।।
बिस्तर ने रात की करवटें समेटी 'उपदेश'।
चाँद ने सफलता से बिखेरी चाँदनी जैसी।।
आओ न तुम पगडण्डी पगडण्डी चलकर।
सहारा की कामना है तुम्हारे बाँह जैसी।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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