बेटियां,जब डोली में बैठकर, आतीं हैं
बड़े अरमान दिल में सजाकर, लातीं हैं
बटोर कर फूल संस्कृति के,एक घर से
दूसरे घर के आंगन में,मन से बिछाती हैं।
कोई उससे छल करें,इस बात से बेखबर वो,
निश्छल निर्मल मन से फूलझड़ियां लुटातीं हैं।
प्रताड़नाओं की हद भी,हद नहीं होतीं
इतनी शक्ति उनमें,न जाने कहां से आतीं हैं।
शरीर पर चोट के निशान,लोग ढूंढते रहते हैं,
पर दिल के ज़ख्मों को वो साथ ले चली जाती हैं।
कितनी विडंबना है कि ये निष्ठुर समाज की,
अमानवीयता का मोल, बेटियां ही चुकातीं हैं।
पति,सास, ससुर,देवर, और ननद
क्या ये रिश्ते इसीलिए बनायी जातीं हैं.......?
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







