बेचैनी का इक़रार: 'मैं ख़ुद में बसी रही हूँ'
न मैं सुकून हूँ, न वो आग, मैं बस तेरी सांसों में बसी रही हूँ, ये वक़्त का फ़ैसला नहीं, मैं तो अज़ल से तैयार थी और बसी रही हूँ।
अरे वो नींद जो तुझको न आई, वो मेरी ही गहन ख़ामोशी थी, मैं तेरी हर करवट में, हर सवाल में, हर पहल बसी रही हूँ।
तू बाहर ढूंढता रहा मुझे, हर शहर और हर बाज़ार में तन्हा, मगर मैं तो तेरी ही सोच के सबसे गहरे मंज़र में बसी रही हूँ।
मुझे तेरा इश्क़ भी मालूम है, वो डर भी जो छुपाया गया था, मैं तेरी हर ख़ुशी से पहले भी थी, और तेरे अंतिम पल बसी रही हूँ।
वो जो क़र्ज़ था ज़रूरतों का, वो अधूरा इल्म था किसी बात का, मैं तेरी हर अधूरी कहानी की सबसे सच्ची ख़बर में बसी रही हूँ।
तू मुझसे भागने को दौड़ा, तू मुझसे लड़ने को ठहरा, ये तेरी ज़िंदगी का फ़ैसला नहीं, मैं तो अस्तित्व की शर्त में बसी रही हूँ।
न तू मेरा शुरुआत है, न मैं तेरा अंजाम हूँ कोई, बस मैं वो वक्त हूँ जो गुज़रता नहीं, बस तेरी ज़िंदगी में बसी रही हूँ।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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