ऐ वक़्त ! थोड़ी देर ठहर जा,
ज़िन्दगी जीनी तो अभी बाक़ी है।
कुछ जज़्बात बयान करने बाक़ी हैं,
कुछ एहसास जीने अभी बाक़ी हैं।
ज़िन्दगी की रफ़्तार में बचपन बीता,
कंधों पर ज़िम्मेदारियों का बोझ आ गया।
हमसफ़र से यूँ मिले सफ़र में
कि कुछ अपने पीछे ही छूट गए।
ऐ वक़्त ! थोड़ी देर ठहर जा,
जिन्हें पीछे छोड़ आए थे,
उनके साथ जीना अभी बाक़ी है।
वक़्त बदला,परिवार बना,
बच्चों की चहचहाहट से आँगन महका।
उनकी अटखेलियों में यूँ खोए हम,
कि हमसफ़र संग कुछ ख़्वाब अधूरे रह गए।
ऐ वक़्त ! थोड़ी देर ठहर जा,
हमसफ़र से दिल की गुफ़्तगू अभी बाक़ी है।
परिवार बढ़ा, रिश्तों की डोर फैली,
दादा-दादी,नाना-नानी का दौर भी आया,
दौड़ती ज़िन्दगी में नजाने कैसे
कुछ रिश्तों के रंग फीके पड़ गए।
ऐ वक़्त ! थोड़ी देर ठहर जा,
कुछ बिखरी ख़ुशियों को समेटना अभी बाक़ी हैं।
ज़िन्दगी के इस खूबसूरत सफ़र की
जिम्मेदारियाँ ख़त्म हो गईं हैं
और आज फिर से हम दो ही रह गए,
मैं और मेरा हमसफ़र।
ऐ वक़्त ! आज भी तुझसे यही कहना है,
थोड़ी देर और ठहर जा,
अपनों के लिए बहुत जी लिए
अपने लिए जीना तो अभी बाक़ी है॥
वन्दना सूद
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







