"ग़ज़ल"
निबाह ज़िंदगी से करता है आदमी!
जीते-जी हर रोज़ मरता है आदमी!!
ज़िम्मेदारी का बोझ अपने कन्धों पे ले कर!
कटीले रास्तों से गुज़रता है आदमी!!
यूॅं ख़ुद को समेटना भी आसाॅं नहीं होता!
हालात से जब टूट कर बिखरता है आदमी!!
क़ीमत नहीं रहती फिर उस की ज़बान की!
जब अपने ही वा'दों से मुकरता है आदमी!!
मरने के बा'द होगा क्या किस को है ख़बर!
इसीलिए तो मौत से डरता है आदमी!!
गर अज़्म-ओ-हौसला हो तो डूबने के बा'द!
बहर-ए-यास से फिर उभरता है आदमी!!
आता है कौन किसी के काम ऐ 'परवेज़!
अपनी ही कोशिशों से सॅंवरता है आदमी!!
- आलम-ए-ग़ज़ल परवेज़ अहमद
© Parvez Ahmad


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







