तक़दीर को तों मैं जाकर मिटाने सें रही
चाहकर भी तेरी जिंदगी में आने सें रही
तू वाक़िफ़ हैं मेरे हाल सें हर मलाल सें
तू ही बता तक़दीर तों आज़माने सें रही
हक़ जिसे समझा वो रहम था मुझ पऱ
जिस पऱ हक़ नहीं उसे तों पाने सें रही
वालदैन,रिश्ते-नाते ये मुहब्बत की बाते
एक जुआ हैं और मैं जीत जाने सें रही
माना मुश्किल बहुत बड़ी है थक गई हूँ
पऱ वक़्त जानता है मैं हार जाने सें रही
ख़ुद ही पीछे हट गई कुछ बोला ही नहीं
ज़ाहिलो को तों आईना दिखाने सें रही
ये जो इलज़ाम लगाते हैं मुझे गिराने को
अना-ओ-नफ़्स पर मैं चोट खाने सें रही
ये जो तुम हों ये जो मैं हूँ और ये बंदिशे
मुकद्दर का लिखा लेख झूठलाने सें रही
तुझे आना हैं तों फिर अभी आजा जानाँ
अपनी रूकती साँसों को मैं बढ़ाने सें रही
कृष्णा की उम्र दर्द-ए-ग़म में ही गुज़र गई
आख़री वक़्त भी तुझें पास बुलाने सें रही...
-कृष्णा शर्मा


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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