दीमक जो लगी मेरे पुस्तकालय में।
कुछ पैसों की किताबें चटकर गईं।
शब्दों के शव थे,पन्नों की राख बनी।
जाने कब ज्ञान की मशालें बुझ गईं।
किताबों की अहमियत कम ही थी।
ज्ञान पहले से ही कुंठित पड़ा हुआ।
विचारों की ज़मीं बंजर होती चली।
किताबों का जड़त्व था सड़ा हुआ।
व्हाट्सएप्प की बहार जो सिर चढी।
ज्ञान अब "फॉरवर्ड" में सिमट गया।
सूचनाओं की बाढ़ में बहकर चला।
सैलाब सच-झूठ सारा निगल गया।
दीमक की पहुंच मगज तक हो गई।
सोच का दायरा सिकुड़ता ही गया।
विजन की कमी,राह की ग़लती हुई।
ज्ञान जब चला भीड़ में गुम हो गया।
आज निकले बीहड़ों में राहें टटोलते।
सवालों के जंगल में सब रहे भटकते।
मूल्य था विवेक के गिरने की सीमा।
समाज का आदर्श सूखे पत्ते हो गए।
सभ्य समाज में जो घुसती चली गई।
दीमक जीवन का मूल्य चट कर गई।
विरासत संवेदना,संस्कृति,शालीनता।
सदियों की नींव खोखली करती गई।
और शेष बचे बस प्रश्न बिखरे अधूरे।
और उत्तर मौन के अंधेरों में डूबे हुए।
दीमक नहीं बस थे विरासत के लुटेरे।
सामाजिक सोच के मंदिर लूटते गए।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







