यह कथा है दक्षकुमारी की,
शून्य में लीन त्रिपुरारी की।
एक नीलकंठ वैरागी थे,
एक वह प्रेम की मारी थी।
सती की तपस्या आखिर
विरक्ति पर भारी थी।
जो परम त्याग महा तपस्वी को भाया था,
सत्य तप के आगे
योगी ने संसार बसाया था।
हुआ मिलन जब उन प्राणों का,
सृष्टि भी मुस्काई थी।
कैलाश के जड़ में,
तब चेतना आई थी।
पर भाग्य ने कैसा खेल सजाया था,
दक्ष के हृदय में
अहंकार भर आया था।
फिर,
अपमान के सम्मुख
प्रेम ने खुद को झोंक दिया।
यज्ञकुंड की ज्वाला में
सती ने स्वयं को होम किया।
सती की अग्नि मौन हुई,
पर शिव का अंतर धधक उठा।
उस शांत वैरागी का,
परम धैर्य सारा ढल उठा।
वह क्रोध का कंपन नहीं,
विरह का क्रंदन था।
वह हृदय का क्रोध नहीं,
शोक का तांडव था।
फिर,
तृतीय नेत्र ने खुलते ही
काल को भी थर्रा दिया,
समस्त अहंकार, दंभ
सब राख में मिला दिया।
जब धरा पर शक्ति
पीठों में स्थिर हुई,
तब महादेव की पीड़ा
चीर हुई।
पर जो प्रेम खुद ही अमरता है,
वह कहां कभी मरता है?
जब प्रेम साकार होकर
अपना रूप बदलता है।
तब हिमालय की गोद में
एक नया अंकुर पलता है।
फिर सती पार्वती बनकर आती है,
प्रेम के लिए
तप का मार्ग सजाती है।
यह तो,
प्रेम की असाधारण परीक्षा थी,
एक का कठोर तप
और एक की निःशब्द प्रतीक्षा थी।
कथा यह उस मिलन की
जो सबसे न्यारी है,
यह गाथा है उस प्रेम की
जो युगों–युगों पर भारी है।।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







