"रामबाण औषधि: हँसी"
खुल कर हँसना सीखो यारों, जीवन की हर पीर मिटे,
हँसी वो अनमोल दवा है, जिससे सब तकदीर लिखे।
बिना दाम की यह औषधि, हर मर्ज को पल में हरती है,
चेहरे पर लाती है रौनक, दिल में खुशियाँ भरती है।
चिंताओं के काले बादल, पल भर में छँट जाते हैं,
जब ठहाकों के मधुर तराने, इस आँगन में गूँजते हैं।
रक्त का संचार बढ़ाती, तन-मन को नवजीवन देती,
हँसी हमारी बिगड़ी बातें, चुटकी में है बना देती।
क्रोध, द्वेष और ईर्ष्या का यह पल में अंत कराती है,
रूठे हुए को पास लाके, बिगड़े रिश्ते सुलझाती है।
हँसता हुआ चेहरा ही जग में, सबको प्यारा लगता है,
उदास बैठे इंसान का तो, साया भी पराया लगता है।
निराशा की सूखी धरती पर, यह सावन बनके बरसती है,
हँसी के दो मीठे बोलों को, आज ये दुनिया तरसती है।
मुश्किलें चाहे जितनी हों, यह हौसलों को जगाती है,
हार को भी जीत में बदले, यह वो ताकत दिलाती है।
उम्र का बढ़ता पहिया भी, हँसी के आगे झुक जाता है,
जो हँसता है खुल कर हरदम, वो बूढ़ा भी युवा नजर आता है।
यह वो योग है, वो प्राणायाम है, जो भीतर से चमकाए,
बिना कॉस्मेटिक्स के भी जो, चेहरे पर नूर ले आए।
तनाव की इस अंधी दौड़ में, यह सुकून का एक झोंका है,
मुस्कुरा कर तो देखो यारों, कुदरत ने दिया यह मौका है।
दिलों की दूरियाँ मिटाकर, यह सबको गले लगाती है,
जात-पात और मजहब से ऊपर, यह इंसानियत सिखाती है।
न कोई गोली, न कोई काढ़ा, न वैद्य की कोई फीस यहाँ,
रामबाण यह नुस्खा ऐसा, रोग टिकेगा भला कहाँ?
तो भूल के सारे शिकवे-गिले, खुशियों के दीप जलाओ तुम,
हँसो और हँसाओ सबको, जीवन को स्वर्ग बनाओ तुम।
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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