खुदा को हमने ऐसे जाना और समझा है खुदा कहां है खुदा का हुक्म क्या है बंदों को और जीवन कैसे गुजरना है हमने ऐसे समझा है आप पढ़ना चाहते हैं तो पढ़ सकते हैं।
उनीस सौ छ्यांबे से पहले हम सब कुछ खो चुके थे मेरी नबीना मां और हमारी खैरियत पूछने वाला कोई नहीं था अल्लाह पर यकीन के सहारे जिंदगी बसर हो रही थी देखने में मां नाबिना को देख रहे थे मां भी नौ जून ऊनीस सौ छ्यांबे सदा के लिए दुनियां छोड़ कर चले गए । हर तकलीफ़ झेलते हुए तमाम फराएज और वाजबात की पाबंद थीं अलावा तहज्जुद गुजार थीं मां और बाप का असर मुझ पर पूरी तरह मुझ पर पड़ा वैसे भी जन्म से जो मां बाप को करते देखा वैसा ही हम भी करते थे ।
मेरे माता पिता सदा कहते थे कि हर दुःख तकलीफ़ मे खुदा पर यकीन रखना वह बंदे को आजमाता है लेकिन उसे आजमाता है जो हर तकलीफ़ झेलते हुए सब्र करता रहा और शुक्रगुजार बनकर जीवन की हर दिन बसर करते हुए देखा खुदा उसे ही आजमाता है जिसका बेहतर सिला मौत के बाद मिलती है और जिसेआखेरत पर धूल मिल यकीन होता ऐसे लोगों को खुदा दुनियां नहीं आजमाता है क्यूं के लज़्जत वो खुशी की तलबगार होता उसे दुनियां में धन सम्मान वो सन्तान मिलती है
मगर बेचैनी में जीवन गुजरती है अहसास नहीं होता लिहाजा लोग क्या करते हैं उसपर धयान देने की जरूरत नहीं है मेरे चिराग आप खुदा की हुक्म और नबी मुहम्मद का फ़रमान पर अमल करते हुए जिन्दगी गुजरना और मां बाप दी हुई तालिम सदा याद रखना है ।
माता पिता याद आए इक दिन और दिल में ख्याल आया कि खुदा से पूछें कि हम ने जन्म से अबतक जितनी दुख तकलीफें देखी समाज वो शहर में ऐसी हादसा किसी में देखने को नहीं मिला आख़िर हम और मेरे मां बाप से क्या गलतियां हुईं जिसका बुरा हाल देखने को मिल रही है जानने का ख्याल आया कि खुदा को कहां तलाश करें कि मुलाकात होने पर अपना हल उन्हें बताया जाए ऐसा हुआ कि दिल ही कहता है कि आप के खुदा से को कुछ भी कहना जो फल मे कहते रहें वह सुनता है और खुदा यहीं दिल में ही रहता है।
मुझसे क्या गलतियां हुई जिसकी सजा मुझे मिल रही है अगर मुझे बता दीजिए तो मैं उस गलती को कभी नहीं दोहराऊंगा इसी तरह से जीवन का गुजरा हुआ हर पल याद करके दिल ही दिल में खुदा से कहता रहा ऐसा महसूस हुआ कि ये हमने गलत किया था उस काम को करने से तौबा कर दिया इसी तरह अपने बचपन की जीवन से लेकर माता पिता जी की हयात की जीवन तक जितनी भी गलतियां की सभी से तौबा कर दिया।
मां की देहांत के बाद पाक और खालिश ज़िंदगी जीना का इरादा खुदा ने याद दिलाया और हमने अमल करने का फ़ैसला किया और हर पल हर लम्हा दिल से कहता हूं की आज किस काम को अंजाम दिया जाए और मेरे दिल में कई बातें उभरती है इसमें किसे Ignour करना है और किसे करना है ये सिलसिला जारी है और जबतक जीवित हैं इस असूल पर ही कायम रहते हुए अपने कामों को अंजाम देता हूं। दिल ने कहा ये शर्त है की इन कामों को कभी भूल से भी नहीं करना है ।
झूठ नहीं बोलना है , किसी का न शिकायत करना है और न सुनना है , आंखो की बुराई से बचना है, किसी की अमानत में ख्यानत नहीं करना है , न खुद को अज़ीम समझना है और न किसी को अज़ीम समझना है ,अगर किसी से बात पूछना है तो पहले सलाम , प्रणाम करना है और अगर तुमसे कोई सवाल पूछे बगैर सलाम के उसे कोई जवाब नहीं देना है, गाली नहीं बोलना है कसम नहीं खाना है , किसी का कोठी, गाड़ी देख कर दिल में नहीं कहना है कि मुझे भी होता और न दिल में हसद रखना है , अगर किसी को सही राह नहीं बता सकते तो उसे गलत राह भी नहीं बताना है , इसके अलावा ऐसी सभी चीजें को नहीं अपनाना है जिससे किसी को नुकसान हो किसी को नुकसान पहुंचा कर फायदा प्राप्त करना इसे प्राप्ति नहीं समझना ये धोका देना समझा जाता है
मतलब इन बातों को दिल में रखते हुए हर वह काम जो आप कर सकते हैं बशर्ते कि काम देने वाला आदमी सच बोलने और इंसाफ़ जेहन का आदमी हो तो उनके साथ काम किया जा सकता है झूठे लोगों के साथ कोई काम नहीं करना है जबकि कोई बड़ा काम देने का वादा किया नहीं करना है क्यूं की सबसे बड़ा काम सच बोलना हक बोलना और इंसाफ़ करना इससे बड़ा कोई काम दुनियां में नहीं है।
सच्चाई , ईमानदारी, अदल वो इंसाफ़ जेहन रखते हुए अपने तमाम कामों को अंजाम देता हूं दिल से ख्याल रखते हुए की दुनियां चंद रोज़ की है जिसे फानी है और मौत के बाद की ज़िंदगी हमेशा रहने वाली है इसलिए सदा रहने वाली जिंदगी को पाने के लिए चंद रोज़ की ज़िंदगी दुःख तकलीफ़ से ही गुज़रे अपने दिल को मना लिया एक असूल पर जीवन गुजारने के लिए अमादा हो गए मगर अपने मुफाद के खातिर दूसरे को हानि पहुंचा कर ज़िंदगी का एक लम्हा गुजारना अच्छा नहीं है।
इसी तरह नमाज़ रोजा तमाम फराएज अदा करता हूं और जो कुछ खाता हूं खाने से पहले तलाश करता हूं कि कोई भूखा तो नही है एक दिन वाकिया है कि तिहाई रात में मस्जिद के अंदर कोई दाखिल हुआ और ये कहते हुए चिल्लाते हुए मस्जिद से बाहर निकल गया कि मस्जिद में जो साहब सोए हुए हैं उनके बदन पर सैकड़ों सांप लिपटा हुआ है और वे आदमी ज़िंदा है
हमने ये आवाज़ सुन लिया था और मेरी आंखें खुली थी और मैं जगा हुआ था लेकिन हमने अपने आंखों से सांपो को नहीं देखा था लिहाजा उस दिन के बाद से वे आदमी और आस पास के लोग मुझ से डरा डरा सा दिखाई देता था फिर हालात कुछ ऐसे बने की इलाका छोड़ने का दिल में हलचल हुआ और वह इलाका छोड़ दिया ।
ऐसे बहुत से घटना मेरी ज़िंदगी में आई है बहुत सी घटनाएं आंखों ने देखा और कुछ घटनाएं नहीं देखा लेकिन दिल में आगाही हो जाती थी इसलिए मुझे खुदा की जात पर बहुत यकीन हो गया जिन लोगों को ऐसी घटनाएं उनके जीवन में नही आई हो इसलिए इन बातों पर उन्हें यकीन नहीं होगा और ऐसे लोग ही आरजी ज़िंदगी को सब कुछ समझते हुए अंजाम देता है इसलिए ऐसे लोगो को सही सोच अच्छी रहन सहन का तरीका नहीं सीखते और नहीं अपनाना चाहते हैं जबकि इस सच्चाई से ज़िंदगी गुजारने में भी मेरे दिल में ऐसी ख्यालें और रास्ता दिखता है जिस राह को अपना लें तो धन दौलत , इज्ज़त शोहरत मिल जायेगी लेकिन मेरा दिल इकरार नहीं करता कि किसी को हानि देकर खुशी नहीं चाहता और वैसे भी नहीं मिलने का है ।
मेरे जीवन की इस कर्म करगुजारी वो कारनामें को खुदा ईनाम में जहन्नुम से मुक्ति दे दे यह बहुत बड़ा ईनाम होगा और दुनियां में इंसान ईनाम दे दे तो यह असली मेहनताना होगा जिसे खुशी से कबूल किया जा सकता है।
वसी अहमद क़ादरी
वसी अहमद अंसारी


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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