“चार दीवारों में कैद मयंक”
सब कुछ है पास मेरे, फिर भी कुछ कमी-सी है,
हँसता हूँ महफ़िल में, पर आँखों में नमी-सी है।
न कोई हमराज़ मिला, न कोई ऐसा यार मिला,
जिसके आगे रख दूँ दिल, ऐसा कहाँ संसार मिला।
नौकरी ने रोटी दी, मगर सुकून छीन लिया,
घर से दूर करके जैसे अपना ही जूनून छीन लिया।
दिन भर जिम्मेदारियों का बोझ उठाता हूँ,
रात को चार दीवारों में खुद से ही बतियाता हूँ।
कभी मन करता है छोड़ दूँ ये दुनिया की दौड़,
फिर याद आता है अभी बाकी है कई रिश्तों का जोड़।
टूटता हूँ तो चुपचाप, बिखरता हूँ तो मुस्काता हूँ,
मैं 'मयंक' हूँ साहब… दर्द अपना खुद ही उठाता हूँ।
शायद जिंदगी ने अभी इम्तिहान और लिखे हैं,
मेरे हिस्से में अभी कुछ खूबसूरत मुकाम और लिखे हैं।
आज अकेला हूँ तो क्या, कल अपना आसमान होगा,
'मयंक' की इस खामोशी का भी एक दिन बयान होगा।
रचनाकार :- डॉ. मयंकेश कुमार दुबे (शिक्षक एवं लेखक)
एम.ए. इतिहास(गोल्ड मेडलिस्ट )
औलेंडा,आगरा, उत्तर प्रदेश
मो. :-8630291252, 8979776231


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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