"डिजिटल युग में हिंदी साहित्य"
फेसबुक की दीवार पर अब दोहे लिखे जाते हैं,
ट्विटर की चिड़ियाँ पर कबीर के बीज चुगाए जाते हैं।
इंस्टा की रील में मीरा का भजन थिरकता है,
यूट्यूब के मंच पर प्रेमचंद का 'होरी' सिसकता है।
कीबोर्ड पर उँगली रखते ही 'निराला' जाग उठे,
गूगल के पन्ने पर 'महादेवी' के आँसू टपके।
ब्लॉग की स्याही से अब 'अज्ञेय' प्रयोग करते हैं,
पॉडकास्ट की लय पर 'मुक्तिबोध' अँधेरे से लड़ते हैं।
किंडल पर 'गोदान' पढ़ता है नया किसान,
व्हाट्सएप ग्रुप में बँटती 'कामायनी' की जान।
पहले डाक से जाती थी पांडुलिपि बेचारी,
अब एक क्लिक में दुनिया पढ़े कविता तुम्हारी।
पर खतरा भी है इस डिजिटल गलियारे में,
शब्दों की भीड़ में अर्थ कहीं हारे न।
लाइक्स की भूख में भाव न मर जाए,
वायरल के चक्कर में साहित्य बिखर न जाए।
फिर भी हिंदी की जड़ें इतनी कच्ची नहीं,
तकनीक की आँधी में उखड़ जाएँ सच्ची नहीं।
तुलसी का मानस तो पत्थर पर भी उकेरा गया,
ये साहित्य तो सर्वर के क्रैश होने पर भी जिया।
नई कलम, नया मंच, नया है अंदाज़,
पर तेवर वही — सच कहने का रिवाज़।
जब तक एक भी उँगली टाइप करना जानेगी,
हिंदी की गाथा डिजिटल में भी तानेगी।
रचनाकार-पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)
दिनांक-27/06/2026


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
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