🌹 "हे! कुसुम केश धारिणी,
मृगनयनी, कहाँ हो?🌹
हे! कुसुम केश धारिणी,
मृगनयनी, चंचल चितवन,
हृदय-मोहिनी, कहाँ हो?
मधुर अधरों पर हास सजाए,
प्रेम-सुधा बरसाने वाली, कहाँ हो?
किस उपवन में फूल चुन रही,
किस कुंज में मुस्काती हो?
किस सरिता के शीतल तट पर,
बैठी गीत सुनाती हो?
किसके स्वप्नों में आकर तुम,
प्रेम के दीप जलाती हो?
किसके सूने हृदय-आँगन में,
मधुरिम वसंत सजाती हो?
तेरे केशों की घनघोर घटा में,
काली रजनी खो जाती है।
तेरे मुख की उज्ज्वल आभा से,
भोर नई मुस्काती है।
तेरी चितवन की चंचल किरणें,
मन के तार हिलाती हैं।
तेरी एक मधुर मुस्कान प्रिये,
सौ-सौ गीत सुनाती है।
तेरी पायल की रुनझुन सुनकर,
पवन ठहर-सी जाती है।
तेरी कंगन की मधुर खनक से,
प्रकृति गीत गुनगुनाती है।
तेरे नूपुर की ध्वनि के पीछे,
मन मेरा दौड़ा जाता है।
तेरे दर्शन की अभिलाषा में,
हर पल नयन बिछाता है।
कभी चाँद की शीतलता में,
तेरा मुखड़ा दिख जाता है।
कभी मेघ की काली घटा में,
तेरा केश लहराता है।
कभी गुलाब की पंखुड़ियों में,
तेरे अधरों का भान होता।
कभी भँवरों के मधुर गुंजन में,
तेरा ही गुणगान होता।
यदि मिलना विधि ने लिखा है,
राहें स्वयं मिल जाएँगी।
सूनी पगडंडियों पर भी फिर,
कलियाँ नई खिल जाएँगी।
समय भले ही परीक्षा ले ले,
धैर्य नहीं खोने दूँगा।
सच्चे प्रेम की पावन लौ को,
आँधी में भी न बुझने दूँगा।
आम्र-मंजरियों की सुगंध में,
तेरी याद चली आती है।
कोयल की मीठी कूक हृदय में,
विरह-राग भर जाती है।
पत्तों की सरसराहट में भी,
तेरा संदेश सुनाई दे।
निर्जन पथ की नीरवता में,
तेरा आभास दिखाई दे।
तुम हो जैसे प्रभात की पहली,
स्वर्णिम किरण सुहानी।
तुम हो जैसे शरद निशा की,
चाँदनी बड़ी मस्तानी।
तुम हो जैसे निर्झर का जल,
निर्मल, शीतल, पावन।
तुम हो जैसे प्रेम-सुधा से,
भरा हुआ मधु-पात्र मनभावन।
तेरे रूप की क्या उपमा दूँ,
शब्द सभी पड़ जाते कम।
तेरे सौंदर्य के आगे प्रिये,
फीका लगता जग का वैभव।
नयन तुम्हारे झील-से गहरे,
जिनमें सपने पलते हैं।
अधरों पर मुस्कान सजी हो,
जैसे फूल मचलते हैं।
तेरी भौंहों की धनुष-कमान,
मन को घायल कर जाती है।
तेरी चंचल दृष्टि अचानक,
हृदय चुरा ले जाती है।
तेरी लट जब गालों पर आकर,
धीरे से लहराती है।
चाँद-सितारों वाली रजनी भी,
लज्जा से झुक जाती है।
पर केवल रूप नहीं प्रिये,
तेरी आत्मा भी प्यारी हो।
करुणा, ममता, स्नेह-सुधा की,
तुम अनुपम फुलवारी हो।
तेरे हृदय की निर्मलता ही,
सबसे सुंदर आभूषण है।
तेरे प्रेम भरे व्यवहारों में,
जीवन का मधु-संचय है।
कितनी संध्याएँ बीत गईं,
कितनी भोरें आईं-गईं।
कितनी बार दिशाओं ने भी,
तेरी आहट मुझे कही।
कितने दीप जलाए मैंने,
कितने फूल चढ़ाए हैं।
तेरी एक झलक की खातिर,
कितने स्वप्न सजाए हैं।
चाँद से पूछा,
क्या तुमने मेरी प्रिया कहीं देखी है?
तारों से पूछा,
क्या उसकी कोई खबर सुनी है?
चाँद बोला—वह रूप सलोना,
किसी हृदय में बसता होगा।
तारों ने कहा—प्रेम सच्चा हो,
तो मिलन स्वयं रचता होगा।
हे कुसुम केश धारिणी!
क्या तुम भी मुझे बुलाती हो?
क्या एकांत की बेला में,
मेरा नाम गुनगुनाती हो?
क्या कभी तुम्हारे हृदय में भी,
कोई मीठी कसक उठती हैं?
क्या मेरी स्मृति तुम्हारे मन में,
बनकर दीपक जलती है?
हे प्राणप्रिये !
यदि सुन सकती हो,
मन की यह पुकार सुनो।
मेरे शब्दों में छिपे हुए,
प्रेम के मधुर उद्गार सुनो।
मेरी हर कविता की धड़कन,
तेरा नाम पुकार रही।
मेरी हर साँस की सरगम,
तेरी राह निहार रही।
आओ प्रिये ! वसंत बनकर,
जीवन में मधुमास सजाओ।
सूने मन के आँगन में तुम,
प्रेम के दीप जलाओ।
मेरी कविता के शब्दों में,
अपनी धड़कन भर जाओ।
मेरे जीवन की पुस्तक में,
सुंदर अध्याय बन जाओ।
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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