🌧️ चतुर्दशी का सावन 🌧️
## 🌧️ चतुर्दशी का सावन 🌧️
आधा सावन बीत गया, मेघों ने मुँह मोड़ लिया,
आज चतुर्दशी आई तो, नभ ने दिल खोल दिया।
सुबह से रिमझिम बूँदें हैं, अरावली भी भीग गई,
सूखी-सूखी मेवाड़ की धरती ने, हरियाली का आँचल ओढ़ लिया।
माटी की सौंधी खुशबू ने, मन के द्वार खटखटाए,
मोरों ने पंख पसार दिए, सावन ने गीत सुनाए।
झीलों की नगरी उदयपुर, आज निखरकर मुस्काई,
हर बूँद में जैसे धरती ने, अपनी बरसों की प्यास बुझाई।
ब्रज की गलियों में पला हुआ, मन कैसे चुप रह पाए,
राधा-कृष्ण की याद लिए, मयंक भी सावन गाए।
मेवाड़ में बरसा सावन तो, ब्रज भीतर तक भीगा है,
आज चतुर्दशी के बाद लगा—
जैसे कान्हा ने स्वयं मेघों को, मयंक के द्वार भेजा है।🌧️
रचनाकार :- डॉ. मयंकेश कुमार दुबे (शिक्षक एवं लेखक)
एम.ए. इतिहास(गोल्ड मेडलिस्ट )
औलेंडा,आगरा, उत्तर प्रदेश
मो. :-8630291252, 8979776231
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The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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