ग़म ही ग़म का ये डाकखाना है,
कोई खुली बरसात थोड़ी है,
इंसानियत इंसान का पहनावा है,
कोई जंहा में बिकने वाला बाजार थोड़ी है,
काबिलियत होती है हर शख्स में,
सफलता में नज़र आए ये मौसम थोड़ी है,
याद रह जाती हैं बातें,
ये मुलाकात थोड़ी है,
इश्क के लिए खुद को तबाह करना,
ये फ़ना थोड़ी है,
अपने ही हाल का जख्म जीना,
ये मज़ाक थोड़ी है,
हकीकत में बार बार आगे बढ़ते रहना,
ये एहसास थोड़ी है,
घुटन का घूंट पीना खुद को ही सीना,
ये जहां थोड़ी है। ।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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