वो अहद (वादा) जो समानता का था, आज भी तन्हा खड़ा रहा है, नक़ाब तो सबने बदल लिया, पर ज़मीर तो गंदा रहा है।
अरे वो नस्लें जो आईं, वो नये रूप में आ गईं वापस, यहाँ मंदिर भी वही है, और क़िस्मत भी ठहरा रहा है।
हमने बनाया था दस्तूर (संविधान) कि सब जीएँगे एक सा अब, मगर इंसान का फ़ैसला अब भी जात पे अटका रहा है।
वो ज्ञान जो रोशनी था, वो अमीर की जायदाद हुआ, किताब तो ख़ुद बोलती है, पर सुनने वाला बहरा रहा है।
सियासत की नज़र में अवाम एक वोट की कीमत है फ़क़त, यहाँ मुद्दा ग़रीबी नहीं, मुद्दा तो फ़िलहाल गुमराह रहा है।
मैंने तर्क दिया था सदियों से, वो अल्फ़ाज़ किताबों में दबे, वो झूठ जो ज़ाहिर था, आज भी ख़ूबसूरत कहा रहा है।
वो मासूम रूहें जो सड़कों पे भूखी मिलीं आज भी, हमारा देवता महलों में बैठा खुशहाल रहा है।
ये अफ़सोस है कि लड़ाई ख़ुद के ख़िलाफ़ थी हमेशा, वो ज़ंजीर जो टूटी नहीं, वो ख़्याल में क़ायम रहा है।
'ए शायर', तेरी क़लम भी तो अंजाम से डरती होगी, मैंने सब कह दिया, अब वहम ये है कि क्या रहा है।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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