शिल्प नहीं भाव रखिए,
रचना का श्रृंगार अपने आप रखिए,
पीड़ा के वो छलछल आँसू,
सुख के झरने में नहीं,
दुख क्यों हुआ -
उसके लिए साहित्य का संसार देखिए,
आँखों में जागरण जगे
तो अपने गले में भी तर्कों का हार देखिए,
क्या लगा ये प्यारा संसार,
अब इसके काम देखिए,
हार को इतनी बदनामी मिले,
जीत को अनजानों से भी प्यार,
पर जीत का जो शोषण हुआ
उसी का दुष्कर्म बार-बार देखिए,
हारने वाला जीतता है,
और तैयारी करता है हार से जीत की,
तब वह खुद को जीताकर
उसका भी अंजाम देखिए,
जिस फलसफे से वो गुज़रा है
वहाँ मिलता है -
कठोरता तड़प रही है,
कोमलता छिन्न-भिन्न हो रही है,
देखता है भाव भी बंजर है,
फिर अगली जीत चुनता है,
नहीं जीते तो हार के भी भाव जीत गए,
देखता है -
जीत में विजयी ने बस सुविधाएं ली हैं
और सृजित करना रह जाता है,
जीत कर भी वो कहाँ जाता है,
साहित्य में बहुत कुछ शब्दों ने बता दिया,
कि शिल्प करना भाव कहां लाता है।।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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