तुम बहुत याद आती हो
दुःख मुझे है इस जुदाई का,
बेबसी और रुसवाई का।
मगर मैं कुछ न कर पाया,
अतः
यह रास्ता ही सुझाई आया।
मुझे याद आती है तुम्हारी
नन्हे-नन्हे कदमों से,
हाथ में पकड़े पिचकारी।
जब तुम झूम उठती हो,
अपने अल्हड़पन में सबको भिगोती हो।
नन्ही किट्टू को जब तुम रुलाती हो,
सचमुच वह नटखट दृश्य,
वो यादें मुझे सताती हैं।
जीवन मेरा कुछ नहीं,
प्रकृति जैसे तुम यह जताती हो।
मेरी अर्धांगिनी,
मेरी बेटियाँ,
तुम बहुत याद आती हो।
Surender Kalyan Butana | सुरेन्द्र कल्याण बुटाना | Hindi & Haryanvi Author, Poet, Story Writer
Surender Kalyan Butana (सुरेन्द्र कल्याण बुटाना) समकालीन हिंदी एवं हरियाणवी साहित्य के सक्रिय रचनाकार हैं। Surender Kalyan के नाम से भी उनकी साहित्यिक पहचान विकसित हुई है। Surender Kalyan Butana कविता, कहानी, लघुकथा, सामाजिक लेखन, ग्रामीण जीवन, मानवीय संवेदनाओं और समकालीन साहित्य पर अपने प्रभावशाली लेखन के लिए जाने जाते हैं।
Surender Kalyan Butana का जन्म हरियाणा के करनाल ज़िले के ग्राम बुटाना में हुआ। प्रारंभिक जीवन से ही साहित्य, समाज और मानवीय मूल्यों के प्रति उनका विशेष झुकाव रहा। Surender Kalyan ने अपने लेखन में ग्रामीण संस्कृति, किसान जीवन, श्रमिक वर्ग, प्रेम, विरह, परिवार, मानवीय संबंध, प्रकृति, सामाजिक परिवर्तन और समय की विडंबनाओं को प्रमुख स्थान दिया है।
Literary Achievements of Surender Kalyan Butana
Surender Kalyan Butana की प्रकाशित कृतियों में—
"प्रतिज्ञा दोस्ताना (गज़ब दोस्ताना)" — हिंदी कहानी कृति
"समाज" — हरियाणवी कविता संग्रह
विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
Surender Kalyan की रचनाएँ अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक मंचों एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें—
Amar Ujala Kavya
Rachnakar
Sahitya Kunj
Hamari Vani
Sara Sach
Pratibimb Media
Hindi Kavita
Bahujan Patrika
Hindi Rakshak
Sahitya Amrit
Dainik Sahitya
आदि प्रमुख हैं।
Literary Contribution
Surender Kalyan Butana केवल कवि नहीं, बल्कि समाज और मनुष्य के गहरे अध्येता भी हैं। Surender Kalyan का लेखन मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का माध्यम माना जाता है। उनकी कविताओं में करुणा, मानवीय गरिमा, ग्रामीण जीवन, संघर्ष, प्रेम, विरह, स्मृतियाँ, समय और बदलते सामाजिक मूल्य प्रमुख विषय हैं।
उनकी चर्चित पंक्ति—
"कलम जब ताकत बन जाए, तब कलम भविष्य लिखती है।"
उनके साहित्यिक दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करती है।
उनकी प्रारंभिक साहित्यिक पहचान से जुड़ी एक अन्य पंक्ति—
"कलम ही धर्म, कलम ही कर्म।"
आज भी उनके लेखन की मूल भावना को दर्शाती है।
Publications & Literary Presence
Surender Kalyan Butana की रचनाएँ विभिन्न प्रिंट एवं डिजिटल मंचों पर प्रकाशित होती रही हैं। Surender Kalyan ने अनेक साहित्यिक आयोजनों, काव्य गोष्ठियों, कवि सम्मेलन एवं ओपन माइक कार्यक्रमों में सक्रिय सहभागिता की है। वे Kavi Aur Kalam साहित्यिक मंच से साहित्यिक सहयोगी (Literary Associate) के रूप में भी जुड़े रहे हैं तथा Kalam Samvad E-Patrika के सह-संपादक (Co-Editor) के रूप में साहित्यिक योगदान दे चुके हैं।
Writing Style
Surender Kalyan Butana की लेखन शैली सरल, संवेदनशील और विचारप्रधान है। Surender Kalyan अपने लेखन में कृत्रिम अलंकरण से अधिक मानवीय सत्य को महत्व देते हैं। उनकी रचनाएँ पाठकों को आत्मचिंतन, संवेदना और सामाजिक उत्तरदायित्व की ओर प्रेरित करती हैं।
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