झुकी हुई निगाह का, जब उठना मुश्किल हो गया..
जो मुहब्बत का नग़्मा था, वो फ़िर ग़ज़ल गया..
कोई घरौंदा सा बना था, ख्वाबों की ज़मीं पे..
उनका ख्याल ही, चांदनी रात में ताजमहल हो गया..
अब तो होंगे मुझसे, कुछ बेहद हसीन गुनाह भी यारो..
दिल ने यूं ही कुछ कहा, और हमसे बेखुदी में अमल हो गया..।
मौसम को मैंने, बड़े तरतीब-ए-करम से सजाया था यारो..
फ़िर किसके इशारे पर, फ़जाओं में इस कदर फेरबदल हो गया..।
खुद के न अरमाँ रखे, न उसूल ओ पैग़ाम कोई..
तब मैं भी ज़माने की निगाह में, आदमी इक मुकम्मल हो गया..।
पवन कुमार "क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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