बादल नभ में छाए हैं,
जीवन-गीत सुनाए हैं।
रिमझिम बूंदें गाती हैं,
सूखी धरती भाती हैं।
प्यासे वन मुस्काते हैं,
पत्ते नृत्य दिखाते हैं।
नदियाँ फिर इठलाती हैं,
कल-कल राग सुनाती हैं।
ताल-तलैया भर जाते,
जीवन के दीप जलाते।
अंकुर सिर उठाते हैं,
खेत हरे हो जाते हैं।
पीपल छाया देता है,
नीम अमृत-सा रहता है।
वृक्ष धरा के प्राण हैं,
इनसे ही वरदान हैं।
जल का मान बचाइए,
हर बूंद न व्यर्थ बहाइए।
जल, जंगल और ज़मीन,
इनसे जग है रंगीन।
मानव यह पहचानो अब,
प्रकृति नहीं है केवल सब।
उसकी गोद सँभालो तुम,
अपना आज बचा लो तुम।
पेड़ लगाओ हर आँगन,
हरियाली हो जीवन-धन।
बरखा का उपहार यही,
संतुलन का सार यही।
प्रकृति यदि मुस्काएगी,
धरती स्वर्ग बन जाएगी।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







