"तेरा साथ" (प्रेम सफर)
"कितनी देर बैठा ऊँगली को पकड़े
दिल धड़कता रहा मुझे संभाले
प्यास थी नदी किनारे,
फिर भी वो आवाज़ थी,
जो नाव पर बैठी,
मगर मेरे घर से पहले,
उस खाली सड़क की तीसरी दूरी पर,
अपना एक निशान छोड़ गयी,
वो उसकी नज़रें थीं
अपने हिस्से में पहचान छोड़ गयी
मौका था कि उसको कह दूँ
कि प्रेम की पहली साँस
पहली बार उस प्रेम को तुम देखो एक बार
मगर ऐसा सोचो
कि कितनी करीब से हम गुज़रते हैं
और फिर भी हम अपने पास हैं
इसके आगे देखो
थोड़ी देर हमने हवा में एक पंख को झूलते हुए देखा
थोड़ी देर हमने अपनी आँख से कुछ खूबसूरत होते हुए देखा
इतने बेचैन हम नहीं थे
वक्त भी जैसे अपने वक्त को छोड़कर
और दस मील की छलांग लगाकर
अगले वक्त तक जा ठहरा
हम इतने कम समय में
एक दूसरे से कहने की आदत बना रहे थे
मगर हम आवाज़ करना चाहते
फिर भी हम आवाज़ सुन रहे थे
इसके आगे देखो
तुमने सोचा कि मैं यहाँ पहले से बैठा था
और मैंने सोचा कि तुम कब के घर से निकल गए
हम दोनों किस इंतज़ार में फिर इंतज़ार कर बैठे
हम दोनों प्यार के किस इशारे को कर बैठे
मगर हमारे प्यार में एक ऐसी निशानी थी
वो पहचानी ना जा सकी
वो पहचानी ना जा सकी क्योंकि उसमें एक कहानी थी
जो हम दोनों के बीच में चलकर
खुद अपनी कहानी से मुँह मोड़कर कहाँ गयी
और हमने देखा कि हम किसी और के चेहरे को देखकर
अपने नूर की थोड़ी सी झलक देखकर
ऐसा महसूस कर रहे थे कि हम दोनों पास बैठे हैं
फिर भी दूर देख रहे थे
बहुत देर तक हमारे बैठने की क्रिया में कोई हलचल नहीं
और इस क्रिया को करते-करते हमने देखा ,
कि प्रकृति ने अपनी अगली क्रिया को कुछ देर के लिए ठहरा दिया
हम खड़े हुए
और दोनों के करीब हमसे कुछ हवाएँ गुज़र रही
कुछ किरणें गुज़र रही
और कुछ देर तक हमने
एक खाली स्थान पर अपने भीतर के एहसास को आने-जाने दिया
मगर हम दोनों नहीं मिले
बस हमने ये कर दिया
कि प्रकृति अपना कार्य करती रहे
हम दोनों मुड़े
और थोड़ी देर चलते रहे
हमने देखा कि शायद हम फिर से पीछे मुड़कर देख सकें
मगर हमने फिर से सोचा कि हम आगे चलते रहें
एक एहसास हमारे मन में था
कि इतनी देर खाली होना
क्या उसका होना
क्या उसके लिए होना
फिर क्यों है खाली होना
और अगर खालीपन ये लगातार रहेगा
तो खुद से ही ये एहसास धीरे-धीरे निकल जाएगा
मगर उनको हम पास पाते हैं
तो लगता है थोड़ा सुकून हमने देख लिया है
मैंने सोचा कि मेरे चलने पर वो गति कर रही होगी
मैं और चलता रहा, वो दूर निकल गई
हम फिर उस जगह नहीं मिले
जहाँ हम मिलकर सिर्फ बैठे
और देखते रहे कि हमारे पास से
हवाएँ, किरणें, खुशबू और हमारी बेचैनी गुजर रही है
लेकिन हमने भी थोड़ी देर सोचकर
अपने आसपास देखना शुरू किया
मुझे याद आता है, मैं खुद भीतर से निकला
अपने भीतर को देखने
उसी भीतर में मैं देखा कि वो पास बैठे थे
मगर मेरे भीतर ने
मेरी बाहरी इन जुबानों को क्यों खामोश किया?
मैं अपने बाहरी उस खालीपन और उस सुकून को लिए
अंदर गया
उस भीतर से कहा, ये नहीं होना था, मगर तुमने किया
उनसे कुछ बात कर लेते
उस सुकून में हम थोड़ी देर रह पाते
हमने सिर्फ सुकून देखा था
लेकिन उसमें रहे नहीं
क्योंकि उनसे कोई बात हुई नहीं
वहाँ से मैं अपने घर तक पहुँचा
उस घर में देखा कि मैं रह रहा हूँ
कि क्या मैं यहाँ भी तो कुछ ना कुछ कहता हूँ?
उनके पास किसी भी जिक्र को करने को
मेरी जुबान पर कोई भी जिक्र ठहरा ही नहीं
उन्हें तो बस मैं देखा कि
मेरे आसपास प्रकृति अपनी वो छोटी-छोटी चीजें कर रही है
जिसे मैं बड़े रूप में सिर्फ देखा और कभी अनदेखे से देखा करता
लेकिन उस दिन उनके पास बैठा तो
प्रकृति की छोटी-छोटी चीजों ने मुझे ज्यादा आकर्षित किया
मैं बैठा और फिर मैं खड़ा रहा
फिर मैं बैठा, यही क्रिया मेरी चलती रही
उनसे बात करनी थी, वो बातें खामोश रहीं
मेरे अंदर मेरे भीतर मैं खुद से बात करता हूँ
मैं बाहर भी खामोश नहीं था, मैं बोलता हूँ
लेकिन उस दिन उनसे बात करने को
मेरा जिक्र, मेरी जुबान, मेरे भीतर के ये एहसास
उस दिन प्रकृति के हाथ लग गए
उस दिन के उस खामोशीपन में
मैं उस रात इतना कहता रहा
लेकिन उस खामोशी में
मैं खुद को हिस्सों में करके
खुद प्रकृति की तरह मैं बटता गया
और मैंने खुद ही को इतना लुभाया, इतना लुभाया
और मैं उस हर कण-कण से पूछने लगा
"उस दिन उनसे मेरी बात हुई नहीं
या तुमने करने नहीं दी?
ये क्यों करते हो?"
"मुझे तुम में अब वो लुभावना पन नहीं दिख रहा है
क्योंकि मैं जब उनसे मिला
लेकिन मैं एक अनमेल सा रहा"
"और इस वजह का कारण अगर मुझे तुम्हें देना है
तो अब मैं तुम्हारे साथ हूँ
और तुम्हें बेचैन करता रहूँगा"
मैंने कण-कण से उसके हाल-चाल पूछे
मैंने प्रकृति के कण-कण में जाकर अपनी आवाज दी
गवाही दी, चिल्लाया, चीखा
उनसे कहा कि "तुमने मेरे वो पल लिए
जो उनके पास बैठे थे
तुमने जिक्र नहीं होने दिया"
"अब मैं चाहता हूँ कि तुम कहाँ हो? क्या करते हो?
मैं उसी पल तुम्हें रोकने आ जाऊँगा"
मैं अब प्रकृति को देख रहा हूँ
कि उसके प्रेम को वो कितना कर पाती है
ये प्रकृति का दोष नहीं है
ये प्रकृति का दोष नहीं है
ये है प्रकृति की वो प्रेम करने की एक लालसा
जो वो मेरे प्रेम को ले गई
उस रात को मैं सोया
थोड़ी देर मैंने सपने देखे
उन सपनों में मैं उनको ढूंढने लगा
मगर मेरे भीतर एक अनचाही गतिविधियों ने
उनको उनके भीतर
मेरे भीतर से निकाल कर
अपने भीतर
उनके सपनों को मेरे सपनों में
इस तरह घुमा कर
मेरी जिंदगी को एक तन्हाई और एक सपने में
मुझे उस रात उनके बगैर
अपने पल को जीने के लिए
थोड़े पल मुझे गुमराह करके
मुझे फिर उसी हाल पर छोड़ दिया
सुबह उठने पर मैंने एक अंतिम बात उस पल को कही
कि मैं किसी भी मिलन को प्रेम के लिए बचाकर नहीं रख सकता
मैं प्रेम को उसके पल जीने के लिए छोड़ दिया
और अंतिम अहसासों के बीच
मैंने बस एक छलक पाई
कि उस पल मेरी साँसें,
उनकी साँसों के साथ मिलकर
उनके भीतर हृदय के उस रक्त में जा घुली
और उस हृदय में मैंने अपना प्रवेश पाया
तब मुझे लगा
कि मेरा ये साँस लेना
कहीं तो काम आया
इतने करीब से हम गुजरे
कि वो अपने पास रहे
मैं कुछ पल के लिए
उनकी साँसों के पास रहा
मगर उस पास रहने में
मैं उनसे इतना दूर था
कि वो मेरी साँसों से
खामोश होकर गुज़र गए
और मैं बस
उनकी साँसों की आवाज़ सुनता रहा
और मैं उस पल को
अपने पास रख लिया
कि उस पल में
मेरी साँसों ने उनकी साँसों को
पास पाया
उनके हृदय में जब उनकी धड़कनों के साथ
मैं भी धड़कता हूँ
तो लगता है कि प्रेम तो नहीं हुआ
हमारी किसी भी या एक ही मुलाकात में
मगर उस प्रेम को लिए
मैं उनके साथ हूँ
अपनी साँसों के साथ हूँ
उनकी साँसों के साथ हूँ
मैं हूँ उनके भीतर
और मैं बस उसी पल के बाद
फिर जीने तो लगा
लेकिन उनके साथ
उनके भीतर
मैं उनके साथ ही गुजर जाऊँगा
अब मैं साँसे तो लेता हूँ
मगर मैं उनके साथ होता हूँ
उनकी साँसों में
और वो मुझे जब चाहे
वो मुझे जब चाहे महसूस कर सकते हैं_
लेकिन वो ये याद रखें
कि उनकी यादों को मैं देख सकता हूँ
एक साँस में मैं उनके भीतर ही रहूँगा
और इसके बाद
मैं उनके हर जन्म में
उन्हीं के भीतर नजर आऊँगा
अगर मैं इस जहाँ से चला भी गया
तो ये मत सोचना कि मेरा कोई आखरी पल वही पल था
मेरा तो आखरी पल उनके साथ जीता रहा
और उनका जो आखरी पल था
मेरे पल को लिए
ना जाने इस जहाँ के किसी कोने में
प्रकृति के उस क्षण को देख रहा होगा
जब हम दोनों उस पल मिले थे
और प्रकृति ने वो रूहानियत का खेला
और हम दोनों ने एक दूसरे से जिक्र नहीं किया
तब शायद हम ही थे वो दोनों
जिन्होंने कोई जिक्र करने नहीं दिया
क्योंकि हम दोनों की साँसे नहीं मिलती
शायद हम ही दोनों हमारे उस पल के गवाह थे
हम ही दोनों हमारे उस पल के किरदार थे
हम ही दोनों शायद उस पल के प्रकृति के साथ खेल करने वाले
या हम ही दोनों को ना जिक्र कर देने वाले
वो गुनहगार थे
कि हम ही ने हम दोनों को उस पल मिलने नहीं दिया
ना कोई जिक्र करने दिया
बस हम दोनों साथ थे
उन साँसों के मिलन के लिए
उनकी कहानी उन्होंने कही
या वो किसी जुबान पर फिर खामोश रही
उनकी कहानी में मैं कहाँ हूँ
मगर उनकी साँसों में
मेरी साँसों ने उनको अपने भीतर उतार लिया
मेरी साँसे जब उनकी साँसों से जा मिली
उनके भीतर रही
तब मेरी उन्हीं साँसों ने
उनकी साँसों को
उनके भीतर को
उन साँसों में समेट लिया
अब मेरी वो साँसे साँसे ले रही है
और उन साँसों ने उनको
वो पल जरूर दिखाए होंगे
कि शायद हम उनको याद आए होंगे।।"
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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