कविता:सूरज का महायज्ञ
दिनांक:26/05/2026
जेठ की जलती दुपहरी में सूरज ने थाली सजाई है,
नौतपा के प्रचंड रूप में अपनी ताकत दिखाई है।
आसमान से बरस रहे हैं अंगारे सुर्ख लाल-लाल,
धरा मां का कोमल आँचल भी तपकर हुआ बेहाल।
सूनी पड़ी हैं राहें और थम से गए हैं सबके कदम,
गर्म हवा के तीखे झोंके जैसे ले रहे हों सबका दम।
घनी छांव की तलाश में व्याकुल भटक रहे हैं पंछी,
मटके के ठंडे पानी की हर बूंद लगती सबसे अच्छी।
पर यह कोई आफत नहीं, यह तो कुदरत का विधान है,
तपेगी नहीं अगर यह मिट्टी, तो कैसे लहकेगा धान है?
यह नौ दिनों की कठिन तपस्या सुख का पैगाम लाएगी,
तपते अंबर से फिर सावन की ठंडी घटा लहराएगी।
मोर नाचेंगे मस्त वनों में और कोयल गाएगी मल्हार,
इस भीषण गरमी का हर कतरा, बरखा का ही आधार है,
कहते हैं 'सत्यवीर' सुनो, इस तपन से ही महकेगा संसार है।
सत्यवीर वैष्णव बारां राजस्थान 💞✒️💞


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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