शांति है तो खोज होती है,
खोज होती है तो सत्य मिलता है,
सत्य में स्वरूप के दर्शन होते हैं,
स्वरूप में स्पष्टता होती है,
स्पष्टता में स्वीकार करना होता है,
स्वीकार एक अनिवार्य और स्वस्थ व्यवस्था होती है,
यह व्यवस्था में एक स्वतंत्रता होती है,
स्वतंत्र होने पर हमें ज्ञान मिलता है,
वह ज्ञान का उपयोग करते करते,
हमें अनुभव मिलता है,
वहीं अनुभव हमें एहसास देता है,
उस एहसास हम समय को जान पाते हैं,
वो समय की गति को पकड़ पाते,
वो गति ऐसी होती है कि हमारे लिए,
कि वर्तमान हमेशा जिंदा रहता है,
ना हम कल में होते हैं,
ना हम अगले कल में होते हैं,
हमारा आज ही रहता है,
आज ही हमारा सुकून है,
सुकून ही एक मुस्कान है,
मुस्कान हमारी विरासत है,
यह विरासत सुख की सीढ़ियां,
सीढ़ियों में चढ़ने पर,
मेहनत करने का मजा है,
मज़ा हमारे मन को मजबूत करता है,
मन से तन का अथाह विकास होता है,
यह विकास हमें आगे बढ़ाता है,
आगे बढ़ने पर हम,
अपने ख्वाब पूरे करते हैं,
यह ख्वाब हकीकत के दरवाजे खोलता है,
इन दरवाजों में,
हमारी पहचान मिल जाती हैं,
वही पहचान हमें मंजिल तक पहुँचाती है,
उस मंजिल में हमारा प्रेम होता है,
वही प्रेम पवित्र और स्वाभाविक है,
ये स्वभाव हमें साक्षी बनाता है,
यह साक्षी होना हमें विवेक और संपूर्णता देता है,
इस संपूर्णता में एक विश्वास होता है,
यह विश्वास ही सबसे बड़ी शक्ति है,
इस शक्ति में अस्तित्व सुरक्षित है,
यही सुरक्षा उजाला है,
यही उजाला राहें बनाता जाता है,
इसी उजाले में राहों से सही मोड़ बनते हैं,
वही मोड़ हमारी निजता तक ले जाते हैं,
वो निजता देती है परिणाम और प्रमाण,
ये प्रमाण ही वो विज्ञान है,
जिससे घटनाएं हुई हैं,
यही घटनाएं उस सम्मान के पास ले जाती हैं,
सम्मान हमें उस ऐश्वर्य में ले जाकर विलीन करती है,
वो विलीनीकरण हमें उस परम का संकेत देती है,
ये संकेत सनातन का आधार है,
ये सनातन शून्य अनंत यात्रा का आनंद देता है,
ये देते देते हम स्वयं ही आनंद हो जाते हैं,
स्वयं की आत्मा अब तन की जगह वहीं आत्मा रहती है,
ये आत्मा अपने कर्म करती नहीं बल्कि वह कर्म हो जाती है,
वो हो जाना हमें सभी शब्दों की लोम विलोम की वास्तविक दुनिया से दूर कर देता है,
वो दुनिया दूर रहकर भी हम उसके पास रहते हैं,
पर अपनी निर्भरता नहीं रखते,
जब निर्भरता नहीं रहती है तब जरूरी कुछ नहीं होता,
वही जरूरी ना होने पर आवश्यकता भी नहीं होती है,
बल्कि स्वेच्छा से रहती है,
स्वेच्छा से भेद नहीं रहता,
भेद नहीं होना ही होने का सबूत है,
वही सबूत हमारे सवालों का जवाब है,
वही जवाब हमारी शांति है,
वही शांति हमें मौन भी कर दे,
तो वही मौन हमारी आवाज है,
वो आवाज सदाबहार है,
सदाबहार ही तो जीवन है,
जीवन ही वह प्रकृति है,
यही प्रकृति तो हमें सारी कहानी बताती हैं,
जो हम जी रहे हैं,
अतः शांति ही पहली परत और कुंजी है।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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