हमने सत्य को ओढ़ा है, जैसे कोई व्रत पुराना,
हर तूफ़ान में डटे रहे, न झुका मन, न कोई बहाना।
“सत्यमेव जयते” की ज्योति, भीतर सदा जलती रही,
तमस भरी इस दुनिया में, राह हमें दिखलाती रही।
पर कभी-कभी यह सत्य भी, हारा हुआ सा दिखता है,
जब विश्वासघात के हाथों, इंसान ही बिकता है।
मन में उठते हैं प्रश्न कई—
क्या सच में सच ही काफी है?
या इस जग में बढ़ने को,
झूठ ही सबसे माफ़ी है?
क्षण भर को यह लगता है—
क्यों न हम भी सीख लें चलना,
चाटुकारिता की राहों पर,
मिथ्या का बोझ लिए ढलना।
पर फिर अंतर्मन कह उठता—
यह राह तुम्हारी हो न सकी,
जो अपनी नज़रों में गिर जाए,
वह जीत कभी सच्ची न हुई।
रात की खामोशी में जब, कोलाहल शांत हो जाता है,
तब एक सुकून दिल को मिलता—
कि सत्य अभी भी जिंदा है।
हार भले ही दिखती हो,
पर यह अंत नहीं कहानी का,
असली विजय वही तो है—
जो रक्षक हो स्वाभिमान का।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







