झपकी सी आने लगी है, सरे-शाम मुझको..
मैं नज़रे चुरा रहा, और ढूँढे है काम मुझको..।
दुनिया को होगा, पसीना बहाने का शगल मगर..
चारागर ने करने को कहा है, आराम मुझको..।
वो बदज़ुबानी से, कुछ का कुछ कहे जाते हैं..
किसी तरह उनकी, ज़ुबां पे लगानी होगी लगाम मुझको..।
हमने तो लिया था हिस्सा, हर मुकाबले में यहां..
मगर मिला नहीं कभी आख़िरी भी ईनाम मुझको..।
वो दूर ही से देख के, बदल लेते हैं राहें अपनी..
वज़ह महज़ ये कि, न करना पड़ जाए सलाम मुझको..।
पवन कुमार"क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







