प्रकृति का मन,
ये आसमां है,
जो अपने भावों को कभी बादलों से,
कभी ऋतुओं से,
कभी मौसमों से,
कभी सूर्य की तपन से,
कभी हवा से,
कभी तूफां से,
कभी कोहरे और ओस की बूंदों से,
प्रकृति का मन खुद को दर्शाता है,
हर पहर में,
खुद की आदतें,
बयान और अभिव्यक्ति करता है,
इसी से हमारे मन को भी,
संकेत मिलते हैं,
इस तरह हमारा ही,
आधा मन प्रकृति का,
आधा मन वंश, परिवार, शरीर, स्वास्थ्य,
पृष्ठभूमि, ज्ञान, शिक्षा, नींद, भोजन, सपनों और हकीकत,
आज के दिन में इसका संचालन,
इत्यादि से मन का निर्माण है,
अतः हम फिर इस पर नियंत्रण ही कर पाते हैं,
ये करना हमारे लिए उचित है,
ये नहीं करने पर समय की देखरेख नहीं है,
नियंत्रण ही उतना ही जितना ये हमें स्वतंत्रता दे,
मन की स्वतंत्रता जो मनुष्य पर भार ना दें,
बल्कि मनुष्य को चुनाव का मौका दे,
मनुष्य की भीतरी हकीकत और जिंदगी की हकीकत में जो स्पष्टता दिखा दे,
स्पष्टता रख दें कि भीतरी आत्म से निकलकर,
मनुष्य की जिंदगी से मनुष्य बाहर धरातल और बाहरी जिंदगी में जो एक स्पष्ट राह दिखा दें,
और राह बना दे,
वही मन है,
वही मन का संवाद,
मन की स्वतंत्रता है,
मनुष्य को उसका जीवन,
उसका मन ही दे सकता है,
मन जीने लगे,
तो तन जिएं,
तन जिएं,
तो मनुष्य जिंदगी जिएं,
जिंदगी जिएं,
तो नज़र आता है,
क्या किया है अब तक,
क्या हुआ हूं उससे,
मन जरूरी है,
मनुष्य के जिंदगी से मेल मिलाप के लिए,
मन स्पष्ट,
तो मनुष्य की जिंदगी स्पष्ट।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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