न जाने क्यों सभी को आज इतनी जल्दी रहती है,
मगर जो दिल की बातें हैं वो बहते-बहते थमती हैं।
घरों की दूरियाँ तो लोग पल में नाप लेते हैं,
दिलों के फ़ासले पर आज क्यों आँखें तरसती हैं।
बैठते हैं पास जो, वो बात करने से भी डरते हैं,
कि हर इंसान के भीतर कोई दीवार रहती है।
सज़ा कर महफ़िलें क्या पा लिया इस दौर ने आख़िर,
जहाँ हर आँख बस वक़्तों का ही तगादा करती है।
हिसाबों की ये जो दुनिया है, ये तो चलती ही रहेगी,
मगर जो रूह का नाता है, वो पाबंदी कहाँ सहती है।
पुरानी उस गली का मोड़ ही कितना सुहाना था,
जहाँ हर साँस बिना सोचे हवा के साथ बहती है।
दिखावे की इस धूप में पिघल जाते हैं सब रिश्ते,
सच्ची छाँव तो बस सादगी के पास रहती है।
चलो अब छोड़ दें हम भी नफ़े-नुक़सान की बातें,
मुहब्बत तो बिना शर्तों के ही इतिहास रचती है।
गले मिलकर जो चुप हो जाए, वही जज़्बात सच्चा है,
ज़ुबाँ तो बस इस दुनिया के झूठे खेल बुनती है।
सँभल ऐ दिल 'ललित' अब तो इस दिखावे की बस्तीसे,
कि जहाँ सन्नाटा भी अपनों की आवाज़ को सुनती है।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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