बनी हो जब तुम जीवन हेतु
जीवन सेतु कौन बनेगा?
कैसे पार लगेगा जीवन,
पल-पल आपस में जो ठनेगा?
एक मंजिल के राही हम तुम,
क्या शिकवा फिर कैसा गिला,
पग-पग पर यूँ रूठ टूट कर,
मत जीवन की बाधा बन।
रख कांधे पर सिर हमारा,
बनना है गर, राधा बन!
चट्टानों के सिर चढ़ जैसे
बल खाता झरने का पानी।
झीने दुपट्टे की ओट से झाँके,
चंचल, कोमल तेरी जवानी।
चंद्रमुखी, मधु-रस छलकाते
बड़े मतवारे, नैन तुम्हारे,
मस्त बहारों की तू मल्लिका,
अनुपम तेरा रूप यौवन।
रख कांधे पर सिर हमारा,
बनना है गर, राधा बन!
चाक कलेजा हो जाता है,
होंठ दबा जब तू मुस्काती।
तू शहजादी प्रेम कलश की,
क्यूँ अंजली भर प्रीत लुटाती?
तुमसे मिलन की बाट जोहता,
मैं सागर युग-युग का प्यासा।
आन मिलो तुझे खुद में समा लूँ
कर अपना सब कुछ अर्पण।
रख कांधे पर सिर हमारा
बनना है गर, राधा बन!
प्रेम पौध जो रोपा तुमने,
मत उसको मुरझाने देना।
बिन पोषण मर जाए वह क्षण,
जीवन में ना आने देना।
विटप विशाल बने यह पौधा,
यही कामना लेकर मन में
कर सिंचन इसका नित, तेरा
हो सुरभित तन-मन, जीवन !
रख कांधे पर सिर हमारा,
बनना है गर, राधा बन!
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©️✍🏻 प्रमोद कुमार


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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