वीर रस
के बल की ना तुम बात करो
ना अभिमान करो भुजाओं का ||
निर्धन रहे ना सदा कँगला
ना राज रहे राजाओं का ||
क्यूं कस कस दबाता आसन को
ना जोर लगा बेकार में
तू मूर्ख बना नादान सा
ना मुझ सा कोई आकार में
उछल कूद ना अच्छी ज्यादा
पतन छुपा अहंकार में
ऊंचे स्वर में ठसक दिखाए
मैं भूत भगाऊं ललकार में
मुझसे करता तू तड़ाक
मैं मिटा कर सब कुछ राख करूं
ना लगाम लगता जिभ्या को
किया अभी मैं तुझको खाक करूं
मैने दर्प ना छोड़ा रावण का
जल भरा खोपड़ी सावन का
सुना भीम बड़ा बलवान है
ना पूंछ उठे हनुमान है
मैने कृष्ण नाम लिखवाया है
फाड़ जरासंध फिकवाया है
तू गौर से देख मैं पर्वत हूं
मैं सर्व नाश मैं अमृत हूं
गगन बदलता रंग देख
प्रकाश अंधेरा संग देख
दुर्योधन तू बात मान मैं काल हूं
मैं विश्वरूप विकराल हूं
ना अपने दंभ से तोल मुझे
मैं समस्त गगन का भार हूं
ना मिलता कुछ यहां मोल मुझे
मैं संपूर्ण विषय का सार हूं
मैं कहता हूं तू बात मान
ओझल हो जा कोई तर्क लगाकर
तू ले ले ज्ञान गुरु से थोड़ा
फिर बात बनाना वितर्क लगाकर
मुझसे उचित बनाकर रखना दूरी
ना मिल जाना कहीं धोखे से
तेरा अंत वही पर होगा उसी पल
फिर ना रुकूं मैं रोके से
नीटू मावी


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







