औरत के नसीब के ताने कुछ यूँ हिस्से में पाए गए
पैदाइश करने वाले के हाथों सें सवाल उठाए गए
फ़रेब-ए-मुक़द्दर में हमें परछाई तक रास न आई
तू ही सोच ज़रा कैसे-कैसे ज़ख्म कंधो पे ढाए गए
अपने घर की चारदिवारी ज़ब ज़िल्लत देने लगी
अश्क-ए-ख़ूँ बिना क़ोई चीख़ निकाले बहाए गए
घुटन एक पल की हों तो भी बर्दाश्त मुश्किल हैं न
तो फिर सोचो कैसे उम्र के दिन हमसे बिताए गए
पत्थर भी टूट जाता हैं ज़ब चोट की गिनती न हों
तो फिर हम जैसे लोग किस हद तक बिखराए गए
कृष्णा क़ो समझ न आए ये जहाँ के रीती-रिवाज़
औरत होने की ज़ात पऱ कितनी बलि चढ़ाए गए...
- कृष्णा शर्मा


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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