सुना है मैंने, मनुष्य आज सबसे कमज़ोर खड़ा है,
भीतर उसके उदासी का एक गहरा समंदर पड़ा है।
पर यह निराशा यूँ ही नहीं, ना कोई मन का वहम है,
यह तो उस नंगे सच की चीख है, जो बेहद बेरहम है।
असली कारण न सोशल मीडिया है, न डिजिटल ये माया,
असली दर्द तो 'कर्ज' का है, जिसने जीवन को भरमाया।
किश्तों में बंद गई है साँसें, और गिरवी रखा है सुकून,
आम आदमी का चूस रहा है ये 'सिस्टम' सारा खून।
दुनिया के सारे संसाधन, मुट्ठी भर लोगों की जागीर हैं,
बस एक फीसदी के हाथों में, सबकी अपनी तकदीर है।
वही रईस, वही मालिक, वही ऊँचे सिंहासन पर बैठे हैं,
हमारे हक़ को छीनकर, अपनी तिजोरियों में पैठे हैं।
सत्ता की इस मखमली चादर तले, उन्होंने भेदभाव को पाला,
धर्म, जात और रंग के नाम पर, दिलों में जहर है डाला।
जब हम आपस में लड़ेंगे, तभी तो उनका राज चलेगा,
इंसान जब बँटा रहेगा, तभी तो उनका धंधा फलेगा।
ये कमज़ोरी नहीं लाचारी है, जो व्यवस्था ने हमें दी है,
ये उदासीनता उस थके हुए मन की, एक मूक गवाही है।
जहाँ खेल पहले से तय हो, और सारे मोहरे उनके हों,
वहाँ हार मान चुका इंसान, अब बस निराश खड़ा है।।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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