इस रंग बिरंगी दुनिया में
सब ने पाया रंग यहां
जो मन में आए विचार मेरे
फिर उनका कैसा ढंग यहां
मैं रंग बताऊं विचारों के
जो मन में बसते सालों से
मैं रंग बताऊं अंग बताऊं
रूप बताऊं ख्यालों के
एक रंग बताऊं पाप का
जो सुर्ख आग सा दिखे है
रूप है उसका आग का दरिया
सेतु ऊपर लपटें हैं
क्या रंग बताऊं पुण्य का
मानो शीतल जल के जागो सा
एक रूप है ऐसा पुण्य का
जैसे बहता झरना फूलों का
मैं छवि बताऊं धर्म की
कोई छतरी ताने अड़ा हो
रंग हो जैसे सबरंगी
जग उसके नीचे खड़ा हो
है कर्म के ढंग थोड़े फूट से
है लंबे मार्ग टूटे से
रंग हो जैसे बुझी आग
मानो रंग है उनसे रुठे से
उस झूठ का रंग अंधेरे सा
वो काला सा धुंधराला सा
दिखता है घनघोर कुआं
समुद्र तक विकराला सा
मैं राह बताऊं सत्य की
वह जाती चीर पहाड़ों को
ना जाने उनका अंत कहां
आजू-बाजू फूल खिले हैं
राह सफेद कोरी है
कोई दिखता है ना जी वहां
क्रोध लगे है दुर्योधन
आंखों से बहता रक्त है
सिर से उठता धुआं धुआं
रंग पुराने लोहे सा
वो वीर योद्धा सा लगे
दिखता फिरता यहां वहां
रूप दया का साधु कुटिया
वहां रेन बसेरा जीवो का
ना कोई किसी से भया करें
रंग दया का दूध सा
कुछ फुलवाड़ी सा हरा भरा
जैसे सांझ सवेरे रहा करें
हैं रंग भी ऐसा हार का
जैसे बहता पानी गार का
रंग बदलती है ऐसे
गिरगिट बदले पहाड़ का
दूर भागता कायर दिखे
पीछे उठती रण में धूल
हार की कोई ना परवाह
घर भी दिखता चांद से दूर
घनघोर घटा बादल से बरसे
जीत विजय कर योद्धा लौटे
रूप विजय का ऐसा लगे
रथ के ऊपर हरि नाथ बिराजे
रक्त से बहती लहार दिखाऐ
रंग जीत का लाल बताएं
कौन कहे ना रंग है जीत
रण योद्धा की जंग है जीत
एक सुख का रूप महल दिखावे
महल के ऊपर मोर नचावे
ना चिंता दिखें किसी बात की
सुखी महल में फूल खिलावे
सुख के कितने रंग बताऊं
हर पल के किया ढंग बताऊं
सुख में सारे रंग जड़ाए
सुख में ना है कोई बलाए
सुख में सुगंध घुली हुई
सुख में हवा खुली हुई
ना किसी बात का दर्द वहां
सुख में दवा मिली हुई
दुख के कितने फैल बताऊं
दुख का रंग मटमैल बताऊं
दुख में जाने कितनी बाधा
दुख में ना है कोई साझा
दुख का रूप वीरान बताऊं
दुख का घर शमशान दिखाऊं
मेरे विचार,
नीटू मावी


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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