ऐ मेरे वतन के लोगों', ज़रा आँख खोल के देखो तो... ये आग बाहर नहीं, भीतर लगी है, और हम सब चुप खड़े हैं।
कागज़ का जंगल, भीड़ की अंधी दौड़, सड़क पे डाकू, कुर्सी पे चोर!
इंसाफ़ 'महँगा' है, 'झूठ' का बोलबाला, तर्कों पे भारी अफ़वाहों का हवाला!
ज़रूरत न रखरखाव की, न कोई सवाल की, बस आदत हो गई है, हर पल हालत बदहाल की!
हमें बाँट रही भाषा, बाँट रहे हैं धर्म, और राजनीति निभा रही है अपना गंदा कर्म!
हर 'अच्छे काम' में 'मेरा क्या फायदा' देखा, यही स्वार्थ है जिसने हमें खोखला कर रखा!
नारी को जंजीर, ज्ञान को डिग्री का पर्दा, यही ख़ुदग़र्ज़ी है जिसने हमें बेरंग कर दिया!
क़र्ज़ है पुरानी इमारतों का, टूटते पुलों का, और ज़हर है उन दफ़्तरों में, रूखे असूलों का!
अब उठो कि पानी सिर से गुज़र गया है, देश टूटा नहीं, हमारी आदत से मर गया है!
हम भीगते रहे जहालत की बारिशों में मगर... बाहर का दुश्मन न आया, हमें अंदर की आदतें खा गईं।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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